आदिग्रन्थो में जल का महिमा वर्णन

आदिग्रन्थो में जल का महिमा वर्णन

आदिग्रन्थो में जल का महिमा वर्णन: सृष्टि के प्रारम्भ से ही जनमानस में जल का विशेष महत्त्व रहा है। भारतीय संस्कृति में जल को जीवन का आधार माना गया है। जीवन के उद्भव और विकास का आधार होने के कारण ही जल को सदैव सहेजने की परम्परा रही है। नदियों को देव तुल्य मानते हुए उनके प्रति अगाध श्रद्धा व्यक्त की जाती है। सदियों से प्रकृति का संचालन जल के द्वारा ही होता आया है।

आदिग्रन्थ के रूप में प्रतिष्ठित वेदों में पानी को प्राणतत्व मानते हुए इसकी स्तुति की गई है। अथर्ववेद में जल को कल्याणकारी बताते हुए कहा गया है कि ‘जो पानी रेगिस्तान में है, जो पानी तालाब में होता है, जो पानी घड़े में भरकर लाया जाये, जो जल वर्षा से प्राप्त होता है, ये सभी जल हमारे लिए कल्याणकारी बनें। …… कुओं का जल हमें समृद्धि प्रदान करे। इकट्ठा किया हुआ जल हमें समृद्धि प्रदान करे, वर्षा का जल हमें समृद्धि प्रदान करे।

जल की पवित्रता का आधार विभिन्न स्रोतों (संसाधनों) को मानते हुए अग्निपुराण (155/5-6) तथा गरुड़ पुराण (आचार 205/113 14) में कहा गया है कि कुएं के जल की अपेक्षा झरने का जल अधिक पवित्र होता है। उससे पवित्र सरोवर का जल तथा उससे पवित्र नदी का जल बताया गया है। तीर्थ का जल उससे भी पवित्र होता है और गंगा का जल तो सबसे पवित्र माना गया है।

पुराणों में जलाशयों की महत्ता उनमें अवधि विशेष तक जल विद्यमान रहने के अनुरूप प्रतिपादित की गई है। मत्स्य पुराण में यह उल्लेख किया गया है कि

शरद काले स्थितं यत् स्यात दुक्त फलदायकम्
वाजपेयति राजाभयां हेमन्ते शिशिरे स्थितम
अश्वमेघ संयं प्राह वसंत समये स्थितम्
ग्रीष्मऽपि तत्स्थितं तोयं राज सूयाद् विशिस्यते।

अर्थात् जिस जलाशय में केवल वर्षाकाल में ही जल रहता है वह अग्निस्रोत यज्ञ का सीमित अवधि का फल देने वाला है। हेमन्त और शिशिर काल तक रहने वाला जल क्रमशः वाजपेय और अतिराम नामक यज्ञ का फल देता है। बसंतकाल तक टिकने वाले जल को अश्वमेघ के समान फलदायक बताया गया है। जो जल ग्रीष्मकाल तक विद्यमान रहता है वह राजसूय यज्ञ से भी अधिक फल देने वाला है। जल की इस जीवनदायी महत्ता ने ही मानव को उसके पवित्र स्वरूप का भान एवं ज्ञान भी कराया, इसी कारण मानव जीवन के प्रत्येक आध्यात्मिक एवं धार्मिक अनुष्ठान में जल का स्थान अतिविशिष्ट रहा है।

जल, जीवन के पर्याय के रूप में अध्यात्म और विज्ञान द्वारा चिरकाल से स्तुत्य रहा है। मानव सभ्यता के इतिहास में मातृ-प्रधान सत्ता के व्यापक प्रमाण मिलते हैं, लेकिन वेदों में जल को जीवों की जननी के रूप में माना गया है। ऋग्वेद (6.50.7) में कहा गया है –

ओमानापो मानुषीरमृक्तं धात तोकाय तनयाय शंयो।
यूयं हिष्ठा भिषजो मातृतमा विश्वस्य स्थातुर्जगतो जनित्री।।

अर्थात् हे जल, मनुष्यहित के लिए क्षतिरहित अन्न को पुत्र तथा पौत्र के लिए प्रदान करो। शान्ति के लिए पृथक्-पृथक् करो, क्योंकि तुम माता से भी अधिक उपकारक हो। तुम सम्पूर्ण स्थावर तथा जंगम जगत की जननी हो; हमारे विकारों को नष्ट करो।

जीवों की उत्पत्ति और पालन का सम्पूर्ण चक्र जल के इर्द-गिर्द ही घूमता है। इसका बड़ा ही रोचक उल्लेख ऋग्वेद (5.83.4) में देखने को मिलता है। इसमें कहा गया है कि जब पर्जण्य पृथ्वी की अपने जल से रक्षा करता है अर्थात् इसे सींचता है, तब वर्षा के लिए हवाएं चलती हैं, बिजलियां गिरती हैं, वनस्पतियां अंकुरित और विकसित होती हैं, अन्तरिक्ष जल की बून्दों को टपकाता है और भूमि सम्पूर्ण संसार के हित के लिए सक्षम हो जाती है।

जल एक रंगहीन, गंधहीन, स्वादहीन, पारदर्शी, वाष्पशील और गतिशील द्रव है जो अलौकिक गुणों से सम्पन्न है। पृथ्वी पर जल का अथाह भण्डार है। इस जल में न तो किसी प्रकार की वृद्धि होती है और न ही कभी कोई कमी आती है। कहने का तात्पर्य यह है कि पानी का न तो विनाश होता है और न ही नया पानी निर्मित किया जा सकता है। इसका केवल रूप परिवर्तित होता रहता है। महर्षि वशिष्ठ द्वारा ऋग्वेद के आपः सूक्त (7.46) में वर्णित चार मंत्रों में जल की पवित्रता, दिव्यता और माधुर्यगुण की प्रभावशीलता देखने को मिलती है।

जल एक औषधि के रूप में विभिन्न देशों के उपचार शास्त्र, आयुर्विज्ञान तथा चिकित्सा पद्धतियों में सर्वोच्च स्थान रखता है। चरक एवं सुश्रुत संहिता के साथ ही सर्वाधिक प्राचीन ग्रन्थ ऋग्वेद तथा अन्य आयुर्वेदिक ग्रन्थों में इसके तत्व चिन्तन पर विस्तार से प्रकाश डाला गया है। जल समस्त रोगों की औषधि है। अथर्ववेद में कहा गया है कि जो जल सोने के समान आलोकित होने वाले रंग से सम्पन्न, अत्यधिक मनोहर, शुद्धता प्रदान करने वाला है, जिससे सवितादेव और अग्निदेव उत्पन्न हुए हैं, जो श्रेष्ठ रंग वाला अग्निगर्भ है, वह जल हमारी व्याधियों को दूर करके हम सबको सुख और शान्ति प्रदान करे-

हिरण्यवर्णाः शुचयः पावका यासु जातःसविता या स्वग्निः ।
या अग्नि दधिरे सुवर्णास्ता न आपः शं स्योना भवन्तु ।।

वेद, उपनिषद् और स्मृतियों के अलावा कई नीति ग्रन्थों में भी जल की शुद्धता पर विशेष जोर दिया गया है, अथर्ववेद में जल की पवित्रता के लिए पृथ्वी से प्रार्थना की गई है और इसे मलिन करने वालों को दण्डित करने की आवश्यकता प्रतिपादित की गई है।

ऋग्वेद में जल संस्कृति का कल-कल प्रवाह है। ऋग्वेद की जल संस्कृति और परम्परा का विकास अथर्ववेद में भी मिलता है। जल सुखी और समृद्ध जीवन का आधार है। शतपथ ब्राह्मण में तो ‘आपो वै प्राणः’ कहते हुए जल को प्राण बताया गया है। सभी देव जल में ही प्रतिष्ठित हैं। देवों तक अपनी स्तुतियां पहुंचाने के लिए भी जल ही साधन है।

स्मृतियों में जल की महत्ता बड़ी गम्भीरता से प्रतिपादित की गई है। इनमें जल को प्रदूषित करने वालों को दण्ड तथा इसका संरक्षण करने वालों को पुण्य का भागी बताया गया है। स्मृतियों में जल संसाधन के रख-रखाव करने वाले को भी पुण्य का भागीदार माना गया है। बृहस्पति स्मृति (62) में कहा गया है कि बावड़ी, कुओं, तालाबों तथा वनों एवं उपवनों का पुनः संस्कार (जीर्णोद्धार) करने वाला मूल रूप से इन्हें निर्मित करने वाले के फल को प्राप्त करता है –

वापीकूप तड़ागानि उद्यानो उद्यानो पवनानि च ।
पुन: संस्कारकर्ता च लभते मौलिक फलम् ।।

वृहस्पति स्मृति में नये तालाब का निर्माण अथवा जीर्णोद्धार करने वाले के लिए समान-सुख और उद्धार की कामना की गई है। साथ ही कहा गया है कि “जो नया तालाब बनवाता है अथवा पुराने का जीर्णोद्धार करता है, वह अपने सारे कुल का उद्धार करके स्वर्ग लोक में महानता को प्राप्त करता है।” स्मृतियों की एक विशेषता यह भी है कि जहां भी जल संसाधनों को आघात पहुंचाने का उल्लेख आया है वहां इन पावन ग्रन्थों में रोचक दण्ड विधान का भी प्रावधान किया गया है। मनुस्मृति में पानी रोकने को आपराधिक कृत्य मानते हुए उसके लिए दण्ड विधान सुनिश्चित किया गया है। शताब्दियों पहले की इन स्मृतियों में जल के संदों का उल्लेख करते हुए गोस्वामी तुलसीदास ने पंचतत्त्वों में जल को मान्यता देकर इस शरीर में जल की मात्रा तथा स्थिति का निर्देश देते हुए सहज, सरल भाषा में लिखा है –

क्षिति जल पावक गगन समीरा, पंचतत्व यह अधम शरीरा ।।

यूनानी परम्परा के प्रसिद्ध दार्शनिक और वैज्ञानिक थेलिस का मत था कि सृष्टि के मूल में पानी की महत्त्वपूर्ण भूमिका है। उनका कहना था कि यह पानी ही है जो विभिन्न रूपों में धरती, आकाश, नदियों, पर्वत, देवता और मनुष्य, पशु-पक्षी, घास-पात, पेड़-पौधों और जीवजन्तुओं से लेकर कीड़े-मकोड़ों तक में उपस्थित है, इसलिए पानी पर चिन्तन-मनन करो। थेलिस का मानना था कि प्रकृति की जिन वस्तुओं को हम संभालकर रखते हैं वे सभी पानी में पनपी हैं और अन्त में पानी में ही समाविष्ट हो जायेंगी। जल से ही धरती का निर्माण हुआ है और यह चारों ओर से पानी से ही घिरी है। यह ईश्वर ही है जिसने हर चीज पानी से बनाई है। चीन के महान् दार्शनिक लाओत्से का कहना है कि ‘जल शक्तिशाली तो बिल्कुल नहीं है, जल से निर्बल और क्या होगा । जल स्थल के अनुरूप ढल जाता है, अपनी तरफ से जल का कोई प्रतिरोध नहीं । उसकी अपनी कोई आकृति-रूप भी नहीं।’

इसके साथ ही लाओत्से का यह भी कहना है कि पानी से दुर्लभ कुछ भी नहीं है लेकिन कठिन को जीतने में उससे बलवान भी कोई नहीं है, इसके लिए उसका कोई विकल्प नहीं है। यह कि दुर्बलता बल को जीत लेती है और मृदुता कठोरता पर विजय पाती है। इसे कोई नहीं जानता है, इसे कोई व्यवहार में नहीं ला सकता है।’

पृथ्वी की सभी प्राचीन सभ्यताएं नदियों के किनारे ही विकसित हुई हैं। प्रमुख उदाहरण के रूप में सिन्धु, सरस्वती, नील, टिगरिस, इफरट्स, दजला-फरात आदि। सभी प्राचीन सभ्यता के सम्प्रदायों में पानी की महिमा का उल्लेख मिलता है। संसार के सभी तत्त्व-चिन्तकों और दार्शनिकों ने बहते हुए जल को जगत का महत्त्वपूर्ण आधार माना है। विश्व की सभी प्राचीन सभ्यताओं यथा-मेसोपोटामिया, मिस, सुमेर, क्रीट, बेबीलोन अथवा सिन्धु घाटी सहित सभी में जल को पूजनीय और पवित्र माना गया है।

सिन्धु घाटी सभ्यता में जल उपासना और जल प्रबन्धन की परिपाटी काफी उच्च स्तर की थी। यहां के लोग शारीरिक शुद्धता के साथ जल देवता की पूजा भी करते थे। यहां के सार्वजनिक अन्या चिन्न: सुजस कुएं व स्नानागार, समुचित जल निकास के लिए निर्मित नालियां इस बात का स्पष्ट प्रमाण हैं कि सिन्धु सभ्यता में जल उपासना पूरी तरह विकसित अवस्था में थी। सिन्धु घाटी सभ्यता के लिए समकालीन मिस, मेसोपोटामिया, सुमेर, सैन्धव, असीरियाई सभ्यताओं से प्राप्त विवरण के आधार पर कहा जा सकता है कि पानी उनके अध्यात्म का महत्त्वपूर्ण माध्यम था। काल के प्रवाह में इतिहास विस्मृत हो जाता है, लेकिन मान्यताओं, धारणाओं और प्रवृत्तियों की झलक पानी के मुद्दों पर कभी मौन नहीं रही। जल प्लावन, जल प्रलय व सृष्टि के जन्म की गाथाएं प्रत्येक सभ्यता, काल तथा क्षेत्र के मिथकों के साथ उनकी संस्कृति में मिलती हैं। मिथक हमारे सांस्कृतिक परिवेश के साथ ही नीतिगत धारणाओं का एक सारतत्व है जो सदैव आने वाली पीढ़ी को अपने अतीत से जोड़ता है। प्रलय और विनाश के बीच पानी प्रत्येक सभ्यता एवं संस्कृति का अंग रहा है।

लेखक:

  • डॉ. कैलाश चन्द सैनी मुख्य अन्वेषण एवं संदर्भ अधिकारी, राजस्थान विधानसभा, जयपुर
  • पुनर्प्रकाशित

Leave a Reply

Your email address will not be published.

error: © RajRAS