बप्पा रावल: गुहिल राजवंश के वास्तविक संस्थापक

बप्पा रावल: गुहिल राजवंश के वास्तविक संस्थापक

मेवाड़ के गुहिल वंशी शासकों में बप्पा रावल (713-810) का महत्वपूर्ण स्थान है। मेवाड़ का शक्तिशाली राजवंश गुहिल के नाम से जाना जाता है इसका प्रारंभिक संस्थापक गुहादित्य थे, जिन्होंने 566 ई. में मेवाड़ राज्य पर गुहिल वंश की नींव रखी |गुहादित्य के पश्चात् 734 ई. में बप्पा रावल को गुहिल वंश का वास्तविक संस्थापक माना जाता है | इनका जन्म मेवाड़ के महाराजा गुहिल की मृत्यु के 191 (ऐ के इक्यानवे) वर्ष पश्चात 712 ई. में ईडर में हुआ। उनके पिता ईडर के शाषक महेंद्र द्वितीय थे। बप्पा के जन्म व माता-पिता के नामों के बारे में विद्वानों में मतैक्य नहीं है, लेकिन इसका बचपन मेवाड़ के एकलिंगजी के पास नागदा गांव में व्यतीत हुआ, इस पर सभी विद्वान एकमत है।

हारीत राशि से सम्पर्क

यहां नागदा के जंगलों में गायें चराते हुए बप्पा का सम्पर्क हारीत राशि (ऋषि नहीं) से हुआ। हारीत राशि पाशुपत- लकुलीश मत में दीक्षित एक सन्यासी थे। बप्पा ने हारीत राशि की खूब सेवा की। हारीत राशि ने अपने जीवन का अंतिम समय जानकर बापा को वरदान दिया कि तुम मेवाड़ के शासक बनोगे और तुम्हारे वंशजों के हाथ से मेवाड़ का राज्य कभी नहीं जायेगा। इस वरदान के साथ-साथ हारीत राशि ने बापा को आर्थिक सहयोग भी किया और यह भी कहा कि तुम्हारा सम्बोधन ‘रावल होगा।

रावल के संघर्ष:

चित्तौड़ का मजबूत दुर्ग उस समय तक मोरी वंश के राजाओं के हाथ में था। परंपरा से यह प्रसिद्ध है कि हारीत ऋषि की कृपा से बापा ने मानमोरी को मारकर इस दुर्ग को हस्तगत किया। टॉड को यहीं राजा मानका वि. सं. 770 (सन् 713 ई.) का एक शिलालेख मिला था जो सिद्ध करता है कि बापा और मानमोरी के समय में विशेष अंतर नहीं है।

इस समय पश्चिम भारत को अरब आक्रमणों से लगातार संघर्ष करना पड़ रहा था। इस विषम परिस्थिति को अनुभव कर बापा रावल ने अरब सेना से टक्कर लेने का निश्चय किया तथा उसने प्रतिहार नागभट्ट प्रथम, सांभर व अजमेर नरेश अजयराज, हाड़ौती के धवल, माड़ (जैसलमेर) के शासक देवराज भाटी एवं सिन्ध के राजा दाहिर से मिलकर एक संयुक्त मोर्चा बनाया। बप्पा रावल के नेतृत्व में इस संयुक्त मोर्चे की सेना व अरब की खलीफा शक्ति से जबरदस्त टक्कर हुई। मुहम्मद बिन कासिम को भी पराजित किया। सिन्ध को मुक्त कराकर इस सेना ने ईरान, ईराक व खुरासान तक का प्रदेश जीत लिया ।

फतुहुल बलदान‘ नामक अरबी ग्रंथ का लेखक बताता है कि अब भारत में पुनः मूर्तिपूजा आरंभ हो गई। इस प्रकार बापा ने मेवाड़ की सीमा को ईरान, इराक व खुरासन तक बढ़ाया और प्रथमबार अरब खलीफाओं के आक्रमणों व धर्म परिवर्तन के प्रयासों पर अंकुश लगाया।

बप्पा रावल बप्पा या बापा वास्तव में व्यक्तिवाचक शब्द नहीं है, अपितु जिस तरह “बापू” शब्द महात्मा गांधी के लिए रूढ़ हो चुका है, उसी तरह आदरसूचक “बापा” शब्द भी मेवाड़ के एक नृपविशेष के लिए प्रयुक्त होता रहा है।

बापा रावल की प्रशासनिक व्यवस्था

बापा रावल ने अपने राज्य की प्रशासनिक व्यवस्था को भी सुदृढ़ किया| इन्होंने अपनी राजधानी नागदा रखी तथा कई निर्माण कार्य भी कराये। उदयपुर के उत्तर में कैलाशपुरी में स्थित एकलिंग जी का मन्दिर का निर्माण 734 ई. में बप्पा रावल ने करवाया | इसके निकट हारीत ऋषि का आश्रम है। आदी वराह मन्दिर, बप्पा रावल ने एकलिंग जी के मन्दिर के पीछे बनवाया |

सोने का सिक्का:

कविराज श्यामलदास के शिष्य गौरीशंकर हीराचंद ओझा ने अजमेर के सोने के सिक्के को बापा रावल का माना है। इसका तोल 115 ग्रेन (65 रत्ती) है। इस सिक्के में सामने की ओर ऊपर के हिस्से में माला के नीचे श्री बोप्प लेख है। बाईं ओर त्रिशूल है और उसकी दाहिनी तरफ वेदी पर शिवलिंग बना है। इसके दाहिनी ओर नंदी शिवलिंग की ओर मुख किए बैठा है। शिवलिंग और नंदी के नीचे दंडवत् करते हुए एक पुरुष की आकृति है। पीछे की तरफ सूर्य और छत्र के चिह्न हैं। इन सबके नीचे दाहिनी ओर मुख किए एक गौ खड़ी है और उसी के पास दूध पीता हुआ बछड़ा है। ये सब चिह्न बपा रावल की शिवभक्ति और उनके जीवन की कुछ घटनाओं से संबद्ध हैं।

बापा रावल ने अपने जीवन के चतुर्थाश्रम में प्रवेश करने पर अपने पुत्र को राज्य सौंपकर हारीत राशि की परम्परा में सन्यास ग्रहण किया और सन्यासावस्था में ही उसका देहान्त हुआ। एकलिंगजी से कोई तीन किलोमीटर उत्तर दिशा में बापा रावल का अन्तिम संस्कार किया गया। इस अन्तिम संस्कार स्थल को आज भी बापा रावल के नाम से जाना जाता है, जहां पर बापा रावल का मन्दिरनुमा समाधि स्थल बना हुआ है।

इतिहासकार की राय में बापा रावल

  • इतिहासकार ओझा ने बापा रावल को एक स्वतंत्र, प्रतापी और विशाल राज्य का स्वामी बताया है।
  • डॉ.गोपीनाथ शर्मा ने बापा का स्थान मेवाड़ के इतिहास में अग्रणी स्वीकार किया है। वह धर्मनिष्ठ था।
  • कर्नल टॉड ने बापा को कई वंशों का संस्थापक व शासक के रुप में मान्यता प्रदान कर मनुष्यों में पूजनीय और अपनी कीर्ति से चिरंजीवी माना है।
  • ब्रिटिश विद्वान चार्ल्स मार्टन ने लिखा है कि उसके शौर्य के सामने अरब आक्रमण का ज्वारभाटा टकराकर चकनाचूर हो गया।
  • कविराजा श्यामलदास ने लिखा है इसमे संदेह नहीं कि बापा हिन्दुस्तान का बड़ा पराक्रमी, प्रतापी व तेजस्वी महाराजाधिराज हुआ। उसने अपने पूर्वजों के प्रताप,बड़प्पन व पराक्रम को पुनः स्थापित किया।

शिलालेखों में वर्णन –

  • कुम्भलगढ़ प्रशस्ति में बप्पा रावल को विप्रवंशीय बताया गया है|
  • रणकपुर प्रशस्ति में बप्पा रावल व कालभोज को अलग-अलग व्यक्ति बताया गया है। हालांकि आज के इतिहासकार इस बात को नहीं मानते |
  • कीर्ति स्तम्भ शिलालेख में भी बप्पा रावल का वर्णन मिलता है|
  • आबू के शिलालेख में बप्पा रावल का वर्णन मिलता है
  • कर्नल जेम्स टॉड को 8वीं सदी का शिलालेख मिला, जिसमें मानमोरी (जिसे बप्पा रावल ने पराजित किया) का वर्णन मिलता है। कर्नल जेम्स टॉड ने इस शिलालेख को समुद्र में फेंक दिया।

सन्दर्भ :

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