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बटेवड़ा अर्थात गोबर कला

ग्रामीण क्षेत्रों की महिलाएं अपनी कलात्मक अभिरुचियां विभिन्न प्रकार से अभिव्यक्त करती रहती हैं। उनमें से एक प्रकार है गोबर कला अर्थात बटेवड़ा। ईंधन के लिए गोबर के छाणे, कंडे अथवा ऊपळे थापे जाते हैं। वर्ष भर चलाने और वर्षा से बचाने के लिए सूखे ऊपळों को गोलाकार अथवा आयताकार रूप में जमा कर उन्हें …

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Gulal Gote

एक जमाना था जब गुलाबी नगर की शान गुलाल गोटों की बड़ी धूम थी। जयपुर के मणिहारों के रास्ते में ये आज भी बनाये जाते हैं। गुलाल गोटे बनाने के लिए लाख में बेरजा और सोपस्टोन पाउडर मिलाकर उसे कढ़ाही में पिघला लिया जाता है। इस लाख को एक डंडी में लिपटा कर आग में …

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सौरत का मेला

सौरत का मेला

हमारे समाज में सदियों से मेलों की अनूठी परंपरा रही है। इनके साथ आम जनमानस की गहरी भावात्मक आस्थाएं जुड़ी हुई हैं। आस्था के ये स्थल न केवल लोक जीवन की झांकी प्रस्तुत करते हैं बल्कि समाज को सांस्कृतिक एकता के सूत्र में भी बांधते हैं। ग्रामीण इलाकों में लगने वाले मेले जहां एक ओर …

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