धरती धोरां री

धरती धोरां री

महाकवि श्री कन्हैयालाल सेठिया द्वारा रचित राजस्थानी गीत ‘धरती धोरां री !‘ राजस्थान का वंदना गीत बन चुका है। राजस्थान का सरस, गौरवशाली वर्णन करने वाले इस गीत के बोल हर राजस्थानी के मन में प्रदेश के गौरव एवं स्वाभिमान को जगाते हैं। गीत में प्रयुक्त अलंकारिक भाषा, भाव, कल्पना, रस — इन सब में गौरव छलकता है।

श्री कन्हैयालाल सेठिया, इस गीत में राजस्थान की महिमा का वर्णन करते हुए कहते हैं की नर-नारी धोरों की धरती राजस्थान की मरुधरा को यश गाते हैं। सूरज इस धरती के कण कण को चमकाता हैं एवं चंद्रमा अमृत रस बरसाता है |

धरती धोरां री !

आ तो सुरगां नै सरमावै,

ईं पर देव रमण नै आवै,

ईं रो जस नर नारी गावै,

धरती धोरां री !

सूरज कण कण नै चमकावै,

चन्दो इमरत रस बरसावै,

तारा निछरावल कर ज्यावै,

धरती धोरां री !

काळा बादलिया घहरावै,

बिरखा घूघरिया घमकावै,

बिजली डरती ओला खावै,

धरती धोरांरी !

लुळ लुळ बाजरियो लैरावै,

मक्की झालो दे’र बुलावै,

कुदरत दोन्यूं हाथ लुटावै,

धरती धोरांरी !

पंछी मधरा मधरा बोलै,

मिसरी मीठै सुर स्यूं घोलै,

झीणूं बायरियो पंपोळै,

धरती धोरांरी !

नारा नागौरी हिद ताता,

मदुआ ऊंट अणूंता खाथा !

ईं रै घोड़ां री के बातां ?

धरती धोरांरी !

ईं रा फल फुलड़ा मन भावण,

ईं रै धीणो आंगण आंगण,

बाजै सगळां स्यूं बड़ भागण,

धरती धोरांरी !

ईं रो चित्तौड़ो गढ़ लूंठो,

ओ तो रण वीरां रो खूंटो,

ईं रे जोधाणूं नौ कूंटो,

धरती धोरांरी !

आबू आभै रै परवाणै,

लूणी गंगाजी ही जाणै,

ऊभो जयसलमेर सिंवाणै,

धरती धोरांरी !

ईं रो बीकाणूं गरबीलो,

ईं रो अलवर जबर हठीलो,

ईं रो अजयमेर भड़कीलो,

धरती धोरांरी !

जैपर नगर्यां में पटराणी,

कोटा बूंटी कद अणजाणी ?

चम्बल कैवै आं री का’णी,

धरती धोरां री!

कोनी नांव भरतपुर छोटो,

घूम्यो सुरजमल रो घोटो,

खाई मात फिरंगी मोटो

धरती धोरांरी !

ईं स्यूं नहीं माळवो न्यारो,

मोबी हरियाणो है प्यारो,

मिलतो तीन्यां रो उणियारो,

धरती धोरांरी !


ईडर पालनपुर है ईं रा,

सागी जामण जाया बीरा,

अै तो टुकड़ा मरू रै जी रा,

धरती धोरांरी !

सोरठ बंध्यो सोरठां लारै,

भेळप सिंध आप हंकारै,

मूमल बिसर्यो हेत चितारै,

धरती धोरांरी !

ईं पर तनड़ो मनड़ो वारां,

ईं पर जीवण प्राण उवारां,

ईं री धजा उडै गिगनारां,

धरती धोरांरी !

ईं नै मोत्यां थाल बधावां,

ईं री धूल लिलाड़ लगावां,

ईं रो मोटो भाग सरावां,

धरती धोरांरी !

ईं रै सत री आण निभावां,

ईं रै पत नै नही लजावां,

ईं नै माथो भेंट चढ़ावां,

भायड़ कोड़ां री,

धरती धोरांरी !

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