ड्राफ्ट राजस्थान पशुधन एवं डेयरी विकास नीति, 2019

ड्राफ्ट राजस्थान पशुधन एवं डेयरी विकास नीति, 2019

राज्य पशुधन एवं डेयरी विकास नीति, 2019 प्रारूप

पशुधन विकास राज्य सरकार के अधिकार क्षेत्र में आता है। इसलिए यह राज्य की जिम्मेदारी है कि वह पशुधन क्षेत्र के समग्र विकास के लिए उपयुक्त नीतिगत दिशानिर्देश तैयार करे और राज्य में सतत विकास सुनिश्चित करे।

इस नीति को उपर्युक्त उद्देश्य के साथ तैयार किया गया है और इसका उद्देश्य कृषि आय में सुधार करना और किसानों के सामाजिक-आर्थिक वृद्धि के लिए अग्रणी क्षेत्र के सतत विकास को प्राप्त करना है।

राज्य पशुधन एवं डेयरी विकास नीति, 2019 दृष्टिकोण

  • पशुधन के उत्पादन और उत्पादकता में वृद्धि कर गरीब व वंचित वर्गों की आजीविका और आत्मनिर्भरता को बढ़ाने एवं सतविकास के माध्यम से पशुपालन क्षेत्र का सुदृढीकरण करना।
  • उत्पादकता, उत्पादन, उत्पाद प्रसंस्करण, विपणन, गुणवत्ता और सेवाओं के मामले में पशुधन क्षेत्र का समग्र विकास, ताकि पशुधन से प्राप्त आय और रोजगार के अवसरों से अधिकतर लोगों को गुणवत्ता पूर्ण भोजन एवं पोषण सुरक्षा मिल सके।
  • उत्पादकता में वृद्धि के लिए पशुओं के देशी नस्लों के जर्मप्लाज्म का संरक्षण एवं संवर्धन तथा जैव विविधता को संरक्षित करना जिसमें नवीन नस्ल सुधार योजनाओं के साथ कृत्रिम गर्भाधान में लिंग वर्गीकृत वीर्य का उपयोग करना भी शामिल हैं।
  • सामाजिक, सांस्कृतिक और पारम्परिक तरीकों पर विचार करने के साथ-साथ तकनीकी, संस्थागत और नीतिगत हस्तक्षेप के माध्यम से क्षेत्र का आधुनिकीकरण।
  • आर्थिक व सामाजिक रूप से पिछडे परिवारों, विशेषकर महिलाओं को,पशुपालन के माध्यम से घरेलु आय में वृद्धि कर सशक्त बनाना |

राज्य पशुधन नीति 2019 का लक्ष्य और उद्देश्य

  1. राज्य पशुधन नीति का उद्देश्य पर्यावरण की रक्षा एवं पशु जैव-विविधता को संरक्षित करते हुए पशुधन उत्पादन और उत्पादकता में सतत् रूप से वृद्धि को प्रभावी तरीके के साथ पशुपालकों की आजीविका को सुनिश्चियन करना है। इस लक्ष्य के साथ, नीति के मुख्य उद्देश्य निम्नानुसार हैं
  2. पशु उत्पादकता और पशुपालक की आय में सुधार के लिए मौजूदा कम लागत वाली उत्पादन प्रणालियों का समर्थन करना ताकि हमारे पशुधन उत्पादकों जिनमें अधिकांश महिलाएं और छोटे किसान हैं, की सामाजिक-आर्थिक स्थिति में सुधार हो सके। पशुधन क्षेत्र के विकास के लिए गुणवत्ता पूर्ण सेवाएं उपलब्ध करवाकर सक्षम वातावरण तैयार करना।
  3. उत्पादों के प्रसंस्करण और मूल्य संवर्धन के लिए नवीनतम प्रौद्योगिकी को अपनाने वाले में आर्थिक रूप से सक्षम मध्यम और बड़े व्यवसायिक पशुधन उत्पादन इकाइयों की स्थापना और विकास को प्रोत्साहित करना।
  4. पशु जैव विविधता के संरक्षण को बढ़ावा देने के लिए राज्य में पशुधन और कुक्कुट की महत्वपूर्ण नस्लों का संरक्षण और उनका आनुवंशिक सुधार करना।
  5. मवेशी, ऊंट और घोड़े पर विशेष ध्यान देते हुए पशुओं की देसी नस्लों के संरक्षण को प्रोत्साहित करना।
  6. पशुधन की चारे की आवश्यकता को पूरा करने के लिये चारा संसाधनों में वृद्धि करना जिससे अधिकतम उत्पादकता प्राप्त की जा सके।
  7. विभिन्न रोगों की प्रभावी रोकथाम, नियंत्रण और उन्मूलन के माध्यम से समग्र पशु स्वास्थ्य को मजबूत करना और किसानों के लिये पशु चिकित्सा सेवाओं का विस्तार करने के लिए डेयरी सहकारी समितियों को प्रोत्साहित/ सक्षम बनाना ।
  8. खाद्य सुरक्षा के लिए अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुसार गुणवत्तापूर्ण पशुधन उत्पादों के उत्पादन पर ध्यान केंद्रित करना।
  9. पशुओं के उत्पाद जैसे दूध और दूध उत्पादों, अंडे, ऊन और मांस और मांस आदि के मूल्यसंवर्धन को प्रोत्साहित करना।
  10. दूध की उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए सहकारी समितियों सहित संगठित डेयरी क्षेत्र की क्षमताओं को बढ़ाना।
  11. प्राकृतिक आपदाओं के दौरान पशुओं की सुरक्षा के लिए किसानों को रसद सहायता प्रदान करना एवं घुमन्तु पशुओं के चरने के लिये सहायता उपलब्ध कराना।
  12. पशुधन के प्रतिस्थापन और नुकसान के मुआवजे के लिए बीमा सहायता उपलब्ध करवाना।
  13. जैविक पशुधन उत्पादन तंत्र को विकसित करने और गुणवत्ता वाले पशुधन उत्पादों के उत्पादन पर ध्यान केंद्रित करना ।
  14. क्षेत्र में बैंकिंग और निवेश को समर्थन तथा प्रोत्साहित करना।
  15. पशुपालक के द्वार पर उन्नत प्रौद्योगिकी और प्रबंधन तकनीक के प्रचार-प्रसार और अपनाये जाने को सुनिश्चित करना ।

इस क्षेत्र में मूलभूत सुविधाओं, पशुधन उत्पादन, प्रसंस्करण, मूल्य संवर्धन और विपणन में सुधार के लिए निवेश को आकर्षित करने हेतु सक्षम वातावरण का निर्माण करना।

डेयरी

मानक गुणवत्ता मानदंडों के अनुसार वैज्ञानिक तरीके से संगठित क्षेत्र में खरीद बढ़ाने के लिए दुग्ध मार्गों में संग्रह केंद्र स्थापित करने के प्रयास किए जाएंगे। यह सुनिश्चित करने के लिए कि अधिक से अधिक दूध की खरीद, प्रसंस्करण और विपणन किया जाये इसके लिये सहकारी और निजी दोनों क्षेत्रों के प्रयासों और संसाधनों का तालमेल किया जायेगा। गुणवत्ता वाले दुग्ध उत्पादन में सुधार के लिए, आवश्यक पशु चिकित्सा सहायता, बुनियादी सुविधाओं और कोल्ड चेन सुविधा का विस्तार सहकारी समितियों को प्रोत्साहित करके और निजी क्षेत्र को प्रोत्साहित करके किया जाएगा।

डेयरी सहकारी समितियों के लिये दुग्ध मार्गों, दुग्ध खरीद, अवसंरचना और प्रसंस्करण क्षमता का विस्तार करने में सहायता दी जाएगी और पशुपालकों को पशु प्रजनन और पशु चिकित्सा सेवाएं प्रदान करने को प्रोत्साहित किया जाएगा।

यह नीति किसानों और उपभोक्ताओं के लाभ के लिए अंतरराष्ट्रीय मानकों की गुणवत्ता और खाद्य सुरक्षा के साथ स्वच्छ दूध उत्पादन को बढ़ावा देगी। दुग्ध गुणवत्ता सुनिश्चित करने के लिए दूध के संग्रहण, भंडारण, परिवहन, प्रसंस्करण और परीक्षण के तरीकों को आधुनिक बनाया जाएगा। मानक गुणवत्ता के अनुसार सुरक्षित दूध की आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए प्रशासनिक और नियामक तंत्र रखा जाएगा।

प्रोबायोटिक्स सहित डेयरी उत्पादों के स्थानीय मांगों को पूरा करने और निर्यात के लिए बढ़ावा दिया जाएगा। डेयरी किसान को बेहतर विपणन अवसर और पारिश्रमिक लाभ सुनिश्चित करने के लिए सार्वजनिक निजी भागीदारी की पहल का समर्थन किया जाएगा।

खाद्य एवं चारा

पुआल एवं कृषि-औद्योगिक उप-उत्पादों के अपव्यय को रोकने के लिए इनका बड़ी मात्रा में उपयोग पशु आहार के रूप में किया जा रहा है, फसल अवशेषों की गुणवत्ता में अभिवृद्धि एवं संकुचन के लिए मौजूदा एवं नवीन विकसित तकनीकों के उपयोग को प्रोत्साहित किया जाएगा।

पशुधन और कुक्कुट क्षेत्र के लिए मोटे अनाज और तेलीय आहार की उपलब्धता को बढ़ाने के प्रयास किए जाएंगे। मक्का सहित मोटे अनाज की उच्च उत्पादक/ संकर किस्मों के उत्पादन को बढ़ावा दिये जाने एवं बुवाई क्षेत्र में विस्तार हेतु कृषि विभाग से परामर्श कर कदम उठाए जाएंगे। पशुओं आहार में प्रोटीन एवं ऊर्जा उपलब्ध कराने के लिए गैर-परम्परागत पशु चारे का उपयोग किया जाएगा।

गुणवत्ता युक्त चारे के बीजों का उत्पादन बढ़ाने के लिए, अधिक उपज देने वाले चारा किस्मों के उन्नत बीजों की उपलब्धता एवं आधुनिक वैज्ञानिक कृषि तकनीकों के माध्यम से प्रोत्साहित किये जाने के प्रयास किये जायेंगे। बंजर व परती भूमि एवं सिल्विकल्चर के उपयोग के माध्यम से चारे की खेती के बुवाई क्षेत्र को बढ़ाने के विशेष प्रयास किये जायेंगे।

गुणवत्तापूर्ण चारा बीज उत्पादन सुनिश्चित करने के लिए उपयुक्त संसाधन और प्रौद्योगिकी उपलब्ध कराई जाएंगी। कम उपजाऊ क्षमता वाली भूमि तथा वन भूमि में कृषक समुदाय के सहयोग से जहाँ तक सम्भव हो चारे की खेती की जाएगी। वर्ष पर्यन्त गुणवत्ता वाले चारे की उपलब्धता के लिए ‘हे’ ‘साइलेज’ एवं चारा बैंकों आदि को बढ़ावा देने पर जोर दिया जाएगा। पशु आहार के गैर-परम्परागत स्त्रोतों जैसे अजोला, प्रसंस्कृत सब्जियां और फलों के अपशिष्ट आदि को बढ़ावा दिया जाएगा।

गौ, भैंस, सूअर, भेड़, बकरी और ऊंट आदि विभिन्न पशु प्रजातियों हेतु मिश्रित आहार के लिए मानक तैयार किये जाएंगे तथा स्थानीय स्तर पर उपलब्ध घटकों से तैयार संतुलित आहार को बढ़ावा दिया जाएगा। गुणवत्ता युक्त संतुलित आहार, बाईपास प्रोटीन एवं वसा के लाभ के विषय में पशुपालकों व कुक्कुटपालकों को जानकारी प्रदान कर शिक्षित किया जाएगा। विशिष्ट पूरक आहार एवं क्षेत्र विशेष में खनिज मिश्रण से संतुलित आहार के उपयोग को बढ़ावा दिया जाएगा।

चराई व सामुदायिक चरागाह भूमि की उपलब्धता एवं उत्पादन क्षमता का आंकलन कर ऐसी भूमि में चारा वृक्ष व घास लगाकर कायाकल्प करने के कदम उठाए जाएंगे। पशुधन के साथ एकीकृत भूमि के उपयोग की योजना को पंचायती राज संस्थानों के माध्यम से प्रोत्साहित किया जाएगा।

राज्य सरकार एवं कृषि/पशु चिकित्सा विश्वविद्यालय के माध्यम से पशु आहार विश्लेषण प्रयोगशालाओं को सुदृढ़ किया जायेगा।

पशु स्वास्थ्य

पशु चिकित्सा सेवाएं: पशु चिकित्सालय, औषधालय, उपकेन्द्र, रोग निदान प्रयोगशालाएं एवं पशु चिकित्सा हेतु मानव शक्ति पहले ही आवश्यकता से काफी कम उपलब्ध हैं। इन सेवाओं में सुधार और संस्थागत विस्तार किया जाएगा और राज्य के स्वामित्व वाली सुविधाओं के रूप में प्रदान किया जाना सतत रूप से जारी रहेगा। पशु स्वास्थ्य सेवाएं मुहैया कराये जाने हेतु आवश्यक सुधार के लिए निजी क्षेत्र में निवेश सहित पशु चिकित्सा स्नातकों को निजी क्षेत्र में सेवाओं हेतु प्रोत्साहित किया जाएगा।

संक्रामक रोगों का नियंत्रण एवं उन्मूलनः पशु रोग एवं कीट न केवल बड़े पैमाने पर पशुधन उत्पादन के नुकसान का कारण बनते हैं, बल्कि पशुधन और पशुधन उत्पादों के निर्यात में भी बाधा उत्पन्न करते हैं। सामुदायिक कल्याण गतिविधि होने के नाते संक्रामक रोगों की रोकथाम एवं नियंत्रण पर जोर दिया जायेगा। गैर सरकारी संस्थानों, सहकारी समितियों और निजी क्षेत्र में पशु चिकित्सकों के सहयोग से इन सेवाओं का धीरे-धीरे विस्तार किया जाएगा। संक्रामक पशु रोगों के प्रसार को रोकने के लिए निर्मित कानूनों को प्रभावी ढंग से लागू करने के लिए मौजूदा तंत्र को सुदृढ़ किया जाएगा।

रोग मुक्त क्षेत्रः राज्य को आर्थिक महत्व के संक्रामक रोगों से मुक्त किये जाने के प्रयास किये जायेंगे। पशुधन उत्पादकता को प्रभावित करने वाले महत्वपूर्ण पशु रोग एफ.एम.डी., पी.पी.आर., ब्रूसेल्लोसिस सहित अन्य प्रमुख रोगों के नियंत्रण और उन्मूलन पर ध्यान केंद्रित किया जाएगा। OIE के दिशा निर्देशानुसार निर्यात सम्भावित क्षेत्रों को रोग मुक्त क्षेत्र बनाया जायेगा। पशुधन एवं कुक्कुट के विभिन्न जीवाणु, विषाणु एवं परजीवी जनित रोगों की रोकथाम व नियंत्रण हेतु सेवाओं को सुदृढ़ किया जायेगा। आवश्यक टीकों की उपलब्धता एवं उनकी गुणवत्ता को भी सुव्यवस्थित किया जाएगा।

रोग निदानः व्यापक स्तर पर पशु स्वास्थ्य हेतु पशु रोगों के त्वरित निदान हेतु पर्याप्त सेवाओं की आवश्यकता होती है। विशिष्ट एवं सामान्य पशु रोग निदान सुविधाओं को गुणवत्तायुक्त प्रबंधन प्रणाली प्रस्तावित कर सुदृढ़ किया जाएगा।

पशु रोग सर्वेक्षण एवं पूर्वानुमानः एकीकृत सर्वेक्षण, सतर्कता, रोकथाम एवं नियंत्रण तंत्र का क्रियान्वयन किया जायेगा। विभिन्न पशु रोगों से सम्बन्धित सूचनाओं के शीघ्र संग्रहण और सत्यापन एवं डेटा बेस प्रणाली के माध्यम से विभिन्न पशु रोग नियंत्रण कार्यक्रमों को शुरू करने में मदद मिलेगी। यह प्रणाली कुछ बीमारियों के सम्बन्ध में अधिसूचित अंतर्राष्ट्रीय दायित्वों को पूर्ण करने में सहायक होगी।

जूनोसिस रोगो का नियंत्रण: मानव स्वास्थ्य की सुरक्षा के लिए जूनोटिक रोगों और पशु चिकित्सा औषधि के दुरुपयोग पर नियंत्रण के लिए जागरूकता पैदा करने के लिए विशेष जोर दिया जाएगा। ऐसी बीमारियों की घटनाओं के प्रसार को रोकने के लिए आवश्यक जैव-सुरक्षा उपाय किये जाएंगे। स्वास्थ्य और परिवार कल्याण विभाग तथा अन्य सम्बद्ध विभागों के साथ समन्वय से एक-स्वास्थ्य की अवधारणा को मजबूत किया जाएगा।

पशु जैव सुरक्षाः राज्य पर्यावरण के लिए हानिकारक एंटीबायोटिक दवाओं एवं अन्य दवाओं के उपयोग को सीमित किये जाने को बढ़ावा देंगे। इस सम्बन्ध में भारत सरकार द्वारा जारी आवश्यक दिशा-निर्देशों को अमल में लाया जाएगा।

आपदा प्रबंधनः विभिन्न प्रकार की प्राकृतिक आपदाओं और सूखे की स्थिति के दौरान पशुधन की उत्पादकता और पशु कल्याण को बनाए रखने के लिए आकस्मिक योजनाएं तैयार कर निष्पादित किया जाएगा। इस तरह की योजनाएं मुख्य रूप से पशु चिकित्सा में सुधार लाने तथा पशुओं के लिए पर्याप्त खाद्य एवं चारा उपलब्ध कराने के उद्देश्य से होंगी।

पशु कल्याणः पशुओं का कल्याण पशुधन उत्पादन प्रणाली का एक अभिन्न अंग है। पशु कल्याण के लिए भूमि के मौजूदा कानूनों की पालना मूल्य श्रृंखला के प्रत्येक चरण में जिसमें उत्पादन, परिवहन, वध, जोतक पशुओं की देखभाल एवं देखरेख सम्मिलित है, सुनिश्चित की जायेगी।

मांस उत्पादन और प्रसंस्करण

पशु उत्पादकों हेतु ग्रामीण क्षेत्रों में मांस उत्पादन सुविधाओं के लिए आवश्यक बुनियादी ढाँचे के निर्माण बढ़ावा दिया जाएगा। एकीकृत आधुनिक बूचड़खानों के निर्माण में कानूनी विनियामक प्रावधानों के अन्तर्गत गुणवत्ता युक्त मांस के उत्पादन के लिए प्रदूषण रहित पर्यावरण, पशुधन उपोत्पादों के अपव्यय में कमी, खाद्य व अखाद्य पशुधन उपोत्पादों के उपयोग को बढावा व मानवीय तरीकों से पशु वध के लिए प्रोत्साहित किया जाएगा।

गुणवत्ता नियंत्रण और खाद्य सुरक्षा

खाद्य सुरक्षा के सिद्धांतों के तहत प्राथमिक उत्पादन प्रणाली पर बल दिया जाएगा ताकि खाद्य सुरक्षा व मुद्दों का पता लगा संपूर्ण खाद्य श्रृंखला जैसे पशुपालक एवं प्राथमिक उत्पादक, खाद्य प्रसंस्करण उद्योगों के साथ-साथ विपणन प्रणाली पर ध्यान केन्द्रित किया जा सके। पशु उत्पादित मूल खाद्य एवं खाद्य उत्पादों को दूषित पदार्थ, टॉक्सिन्स, रोगकारकों, कीटनाशी, एंटीबायोटिक अवशेष, हानिकारक योजक एवंमिलावट से मुक्त किया जाना सुनिश्चित किया जाएगा ।

आहार की विधियों, उपचार व गुणवत्तायुक्त उत्पादन के तरीकों का पता लगा जैविक पशु खाद्य पदार्थों के उत्पादन को प्रोत्साहित किया जाएगा। उत्पादन की मानकीकरण प्रक्रिया तथा जैविक खेती के लिए प्रमाणिकरण प्रणाली स्थापित की जाएगी।

खाद्य सुरक्षा मानकों के बारे में किसानों और उपभोक्ताओं के बीच जागरूकता पैदा करने को बढ़ावा दिया जाएगा।

संस्थागत ऋण और पशुधन बीमा

पशुधन क्षेत्र की उत्पादकता और उत्पादन के पूर्ण दोहन की विद्यमान क्षमता को प्राप्त करने के लिए संस्थागत ऋण की समय पर उपलब्धता और पहुंच प्रत्यक्ष तौर से प्रभावित होती है। इसलिए, विशेष रूप से छोटे धारकों के लिए ऋण तक पहुंच को आसान बनाने के उपायों को आवश्यक विनिर्माण एवं विपणन के साथ सुविधाजनक बनाया जाएगा।

पशुपालन सम्बन्धी गतिविधियों के लिए साख उपलब्ध कराये जाने के दृष्टिगत लघु कृषकों/ किसानों को स्वयं सहायता समूहों या संयुक्त देयता समूहों के रूप में संगठित किये जाने के लिए प्रोत्साहित कर सम्बल प्रदान किया जायेगा। आवश्यक बुनियादी ढांचे के निर्माण और सुदृढ़ीकरण के लिए चयनित समूहों को राज्य सरकार द्वारा सहायता प्रदान की जायेगी। समुहों में इस प्रकार गतिविधियों हेतु निजी जन सहभागिता के माध्यम से संस्थागत वित्त और विपणन के लिए प्रयास किये जायेंगे।

प्राकृतिक आपदाओं और बीमारी के प्रकोप आदि के कारण होने वाले जोखिमों के प्रति उचित सुरक्षा के लिए पुर्नभुगतान पशुधन उत्पादन प्रणाली विकसित की जायेगी। सभी पशुपालकों के लिए पशुधन बीमा के माध्यम से पुर्नभरण को सुलभ बनाया जाएगा।

ऊंटों का संरक्षण:-

ऊंटों में मरुस्थलीय विशिष्ट जोतकता शक्ति, रोग प्रतिरोधक क्षमता, दूध व खेल गुणों में सुधार के लिए प्रभावी उपाय किए जाएंगे। ऊंटों के संरक्षण एवं संवर्द्धन के लिए और विशेष कार्यक्रम शुरू किए जाएंगे। ऊंटनी के दूध के औषधीय गुणों के दृष्टिगत इसके उत्पादन, खरीद और विपणन को बढ़ावा दिया जाएगा।

गौशाला विकास

गोशाला विकास नीतियों को इस उद्देश्य के साथ तैयार किया जाएगा कि ये प्रोत्साहन आधारित बेसहारा पशुओं के लिए आश्रय एवं पशु सुधार केंद्र के रूप में कार्य कर सकें।

गोशालाओं को आय के स्रोत के रूप में आधुनिक खेती और प्रबंधन तकनीकों सहित पंचगव्य के सिद्धांत के उपयोग को अपना आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर ईकाइयों के रूप में विकसित करने के लिए प्रोत्साहित किया जाएगा।

पशुधन और पर्यावरण

प्रबंधन एवं आहार प्रणालियों को संशोधित करने का प्रयास किया जाएगा ताकि जुगाली करने वालों पशुओं द्वारा ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन को कम किया जा सके। उच्च तन्तु युक्त चारे का साइलेज में परिवर्तन तथा ऐसे चारे को छोटा-छोटा काट कर खिलाये जाने को प्रोत्साहित किया जाएगा।

फार्म खाद के बेहतर प्रबंधन के लिए विभिन्न कार्यक्रमों के अन्तर्गत खाद और बायो-गैस संयंत्रों के माध्यम से प्रयास किए जाएंगे।

पशुधन, चारा और अपशिष्ट प्रबंधन की बेहतर तकनीकों से जागरूक किये जाने केप्रयास किये जायेंगे।

सूचना प्रणाली और मानव संसाधन

पशु उत्पादन और पशु स्वास्थ्य पर आधारित डेटाबेस उचित योजना तैयार किये जाने के लिए महत्वपूर्ण है। मौजूदा डेटा गैप की पहचान कर डेटा तैयार करने व उचित नियोजन तथा कार्यक्रम क्रियान्वयन के लिए इसे प्रचारित करने के लिए कदम उठाए जाएंगे। किसानों एवं अन्य उद्यमियों के कल्याण की दिशा में विभिन्न कार्यक्रमों के प्रभाव का आंकलन करने के लिए इन आंकड़ों का विश्लेषण किया जाएगा।

मानव शक्ति की गुणवत्ता एवं गुणात्मक कमी को पूरा करने के लिए मानव संसाधन विकास को प्राथमिकता दी जाएगी। पशु चिकित्सकों एवं लाभान्वित कृषकों के कौशल विकास पर ध्यान दिया जायेगा। विभिन्न कार्यक्रमों को सम्बल प्रदान किये जाने के लिए मानव संसाधन की इष्टतम आवश्यकता का अनुमान लगाकर सरकार व निजी क्षेत्र की भागीदारी के माध्यम से पूर्ण करने के लिए कदम उठाए जाएंगे।

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