मारोठ कला

मारोठ कला

राजपूताना हमेशा से अपनी कला व संस्कृति के लिए प्रसिद्ध रहा है। राजपूताना व शाही रजवाड़ों के महल, मंदिर व किले हमेशा से इस कला व पेंटिंग्स से सुसज्जित हुए हैं। अंधेरे कमरे में जब रोशनी की एक किरण के हजारों प्रतिबिम्ब खुदे हुए या कटे हुए शीशों के बीच जगमगाते हैं तो वह अद्भुत दृश्य कहलाता है। शीशों की यह स्वर्णजड़ित सुन्दर नक्काशी ही मारोठ कला का आधार है।

आमेर का प्रसिद्ध शीश महल मारोठ कला का बहुत ही सुंदर उदाहरण है। इसी तरह सामोद महल, अजमेर जैन मंदिर, बढ़नगर गुजरात का रामचंद्र मंदिर इसी कला के कुछ अन्य उदाहरण हैं।

मारोठ कला मात्र नक्काशी तक ही सीमित नहीं है बल्कि इसके अंतर्गत मूर्ति शिल्प, भवन निर्माण व चित्रकारी का कार्य भी किया जाता है। सोने का पानी चढ़ी चित्रकारी व नक्काशी किए हुए कांच से सुसज्जित यह कला जयपुरी, ईरानी, पर्सियन, राजपूताना व मुगल कलाओं का समायोजन है।

परम्परागत मारोठ कला

परम्परागत मारोठ कला नागौर जाति के कुमावतों की संघर्ष की कहानी को बयां करती है जिसका उत्कर्ष जयपुर से 120 किमी की दूरी पर बसे गांव मारोठ से हुआ।

16वीं सदी की इस कला के कारीगर सीकर, राजस्थान से मारोठ के महाराज रघुनाथ सिंह जी के निमंत्रण पर मारोठ आए तथा फिर हमेशा के लिए यहीं के हो गए। सबसे पहले इस कला के मास्टर क्राफ्टमैन 1606 में लक्ष्मण सिंह कुमावत रहे। उनके बाद उनके पुत्र जयकिशन कुमावत ने इस परम्परा को आगे बढ़ाया। सोलहवीं सदी में जैन समुदाय इस कला की तरफ खासा आकर्षित हुआ। जैन हस्तलिपियों व भित्तिचित्रों में जैन दर्शन का सम्पूर्ण इतिहास समाविष्ट रहता है। इसी को सोने की कारीगरी से सुसज्जित व संरक्षित करने के लिए मारोठ लाया जाने लगा । इस तरह मारोठ कला का गढ़ बनता गया । जयकिशन को इस कला में और अधिक दक्षता हासिल करने के लिए कुचामन भेजा गया। यह समय मारोठ कला के उत्थान का समय था जब जैन समुदाय का रुझान इस ओर बढ़ा।

17वीं शताब्दी में ईरान से एक कलाकार भारत घूमने आया। घूमते हुए वह आमेर महल पहुंचा जहां उसने जैन ग्रंथों का अवलोकन ही नहीं किया अपितु वह विख्यात जैन संत टोडरमल से भी मिला। टोडरमल ने उसे मारोठ कलाकारों द्वारा किए जाने वाले सोने की कलमकारी के कार्य से रूबरू कराया। यह कलाकार मारोठ की इस कला से इतना प्रभावित हुआ कि उसने इन कलाकारों से न केवल मारोठ कला की जानकारी हासिल की बल्कि उन्हें कांच की पचीकारी या कटग्लास की कला की बारीकियां भी सिखाई। धीरे-धीरे यह कला राजस्थान तक ही सीमित न रह कर देश के अन्य राज्यों जैसे बंगाल, बिहार, आसाम, नागालैंड, हरियाणा आदि में भी खासी प्रसिद्ध हो गई।

सुभाष कुमावत

सिविल इंजीनियर सुभाष विरासत में मिली कला को पिछले 40 वर्षों से नयी ऊंचाइयां दे रहे थे तथा अब उनके बाद उनके दोनों पुत्र सुनील व अनिल इस कला को आगे बढ़ा रहे हैं।

प्रायः इस कला के लिए शीशे को इंग्लैंड व बेल्जियम से आयात किया जाता था पर सुभाष कुमावत ने अपने वर्षों के अनुभव से एक क्रांतिकारी परिवर्तन लाते हुए भारत में ही इस तरह के शीशों के निर्माण का आगाज कर दिया। रांगे पॉलिश की जगह सिल्वर पॉलिश, तांबे की पॉलिश व इनेमल का रंग लेप कर अलग तरह के टैक्सचर के साथ ऐसा दर्पण बनाया जिसमें एक आकृति के हजारों प्रतिबिंब दिखाई देते। देश ही नहीं विदेशों जैसे बीजिंग, चाइना आदि में भी धूम-घूम कर इस कला को सुभाष ने खासा लोकप्रिय बनाया है। सवाई माधोपुर का महावीर जी मंदिर व कमलाबाई आश्रम का जैन मंदिर, उत्तर प्रदेश में बड़ोद, झांसी, दीमापुर नागालैंड के मंदिर सुभाष की कला से सुसज्जित कुछ एक उदाहरण है।

इसी तरह कुछ नया करते हुए सुभाष के पुत्र अनिल ने एक ऐसे केमिकल की रचना की है जो इन सोने जड़ित पेंटिंग्स को लम्बे समय तक बारिश के पानी व मौसम के कुप्रभावों से बचाए रख कर उनके रंगों को पक्का बनाए रखता है। कुमावत परिवार के ये कलाकार तमाम प्रतिकूल परिस्थितियों के बावजूद अपनी गौरवशाली कला व परम्परा को जीवित रखे हुए हैं।

आभार:
  • अनुभा अग्रवाल – उनके द्वारा लिखे गए लेख |

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