पशुओं में लम्पी स्किन रोग

पशुओं में लम्पी स्किन रोग

लम्पी स्किन रोग एक संक्रामक रोग है जो वायरस की वजह से तेजी से फैलता है और कमजोर इम्यूनिटी वाले मवेशियों खासतौर पर गायों को प्रभावित करता है।

  • यह रोग अफ्रीका और पश्चिम एशिया के कुछ हिस्सों में पहली बार 1929 में खोजा गया था। दक्षिण पूर्व एशिया में इसका पहला मामला जुलाई 2019 में बांग्लादेश में दर्ज किया गया था।
  • यह वायरस ‘कैप्रिपॉक्स वायरस’ जीन्स के भीतर तीन निकट संबंधी प्रजातियों में से एक है, इसमें अन्य दो प्रजातियाँ शीपपॉक्स वायरस और गोटपॉक्स वायरस हैं।
  • देश में गायों और भैंसों में लंपी स्किन रोग वायरस का संक्रमण बढ़ता ही जा रहा है। जिसकी वजह से गुजरात, राजस्थान सहित कई राज्यों में हजारों की संख्या में मवेशियों की मौत हो चुकी है। मरने वाले पशुओं में सबसे बड़ी संख्या गायों की है।

संचरण

लंपी स्किन रोग मच्छरों, मक्खियों और टिक्कों और लार और दूषित पानी और भोजन के माध्यम से फैलता है।

  • लम्पी स्किन रोग पशुओं से मनुष्यों में नहीं फैलता है।

लम्पी स्किन रोग के लक्षण

इस रोग में पशु को तेज़ बुखार आता है। त्वचा में सूजन व मोटी-मोटी गांठे उभरती है। पशु को चारा खाने में परेशानी होती है व दूध उत्पादन क्षमता भी कम हो जाती है।

  • यह पूरे शरीर में दो से पांच सेंटीमीटर व्यास की गांठों के रूप में प्रकट होता है, विशेष रूप से सिर, गर्दन, अंगों, थन (मवेशियों की स्तन ग्रंथि) और जननांगों के आसपास। गांठें धीरे-धीरे बड़े और गहरे घावों की तरह खुल जाती हैं।

लम्पी स्किन रोग उपचार

इस रोग का कोई ठोस इलाज न होने के चलते सिर्फ वैक्सीन के द्वारा ही इस रोग पर नियंत्रण और रोकथाम की जा सकती है। हालांकि पशु चिकित्सा विशेषज्ञों के अनुसार कुछ देसी और आयुर्वेदिक उपायों के माध्यम से भी लंपी रोग से संक्रमित हुई गायों और भैंसों ठीक किया जा सकता है।

राज्य सरकार द्वारा उठाये गए कदम

जिन जिलों में लम्पी स्किन डिजीज फैली हुई है वहां दवाइयों की विशेष व्यवस्था की गई है। साथ ही दूसरे जिलों के डॉक्टर्स यहां भेजे गए हैं। राज्य सरकार की ओर से रोग के त्वरित इलाज हेतु अलग से फंड जारी किया गया है। साथ ही जिस गाय की मृत्यु इस रोग से हुई है उसको दफनाने के लिए ग्राम पंचायतों को निर्देश दिए गए हैं। गौशालाओं में लम्पी रोग से पीड़ित गायों को अलग रखने की व्यवस्था की गई है। ताकि स्वस्थ गायों के वैक्सीन लगाया जा सके। राज्य सरकार द्वारा दिए गए निर्देश :

क्या करेंक्या नहीं करें
पशुओं में रोग के प्रारम्भिक लक्षण दिखाई देने पर रोगी पशुओं को अन्य स्वस्थ पशुओं से अलग करें। संक्रमित क्षेत्रों में गोट पॉक्स का टीका नहीं लगवाएं।
रोगी पशुओं के उपचार हेतु नजदीकी पशु चिकित्सालय से सम्पर्क करें।रोगी पशुओं को खिलाने-पिलाने के बाद बचे हुए चारा-दाना व पानी को अन्य स्वस्थ पशुओं नहीं खिलाएं-पिलाएं।
पशु गृह/गौशालाओं को संक्रमण से मुक्त करने के लिए सोडियम हाइपोक्लोराइट के 2 प्रतिशत घोल का छिड़काव किया जाना चाहिए।स्वस्थ एवं रोगी पशुओं को चारा-दाना एवं पानी साथ साथ न दें।
मृत पशु के शव का निस्तारण वैज्ञानिक विधि से ही करें। इसके लिए 1.5 मीटर की गहराई का गड्ढा खोदकर मृत पशु के शव पर चूना व नमक डालकर कर दफना दें।स्वस्थ पशुओं से पहले रोगी पशुओं के दैनिक कार्य नहीं करें।
पशु बाड़े में नियमित रूप से साफ-सफाई एवं हवावरोशनी की पर्याप्त व्यवस्था रखें।रोग प्रकोप के दौरान पशुओं का क्रय-विक्रय नहीं करें।
रोगी पशु को संतुलित पशु आहार/हरा पौष्टिक चारा खिलाएं।पशु बाड़े में पशुओं के गोबर व मूत्र को एकत्रित नहीं रखें।
रोगी पशु के दूध को उबालकर काम में लिया जा सकता है।
वर्तमान में रोग से बचाव हेतु गोट पॉक्स वैक्सीन को पशु चिकित्सा अधिकारियों के दिशा निर्देश अनुसार लगवाया जाए।

राज्य स्तरीय नियंत्रण कक्ष : 0141-2743089/181

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