राजस्थान की मध्यकालीन भू राजस्व व्यवस्था

प्रशासन के तीन प्रमुख स्तम्भ थे सैनिक व सामान्य प्रशासन दूसरा न्याय व्यवस्था और तीसरा भू-राजस्व व्यवस्था, सैनिक और न्याय व्यवस्था के समान ही भू राजस्व व्यवस्था में भी सामन्तों की भूमिका महत्त्वपूर्ण थी। मध्यकाल में कृषि ही आय का मुख्य स्रोत था, इस दृष्टि से भूमि और उस पर उत्पादित फसल पर लगान वसूल करने वाली संस्था का विशेष महत्व था। भूमि दो भागों में विभाजित थी एक खालसा भूमि जो कि सीधे शासक के नियंत्रण में होती थी, जिसे केन्द्रीय भूमि भी कह सकते है। दूसरी जागीर भूमि यह चार प्रकार की थी।

  1. सामन्त जागीर
  2. हुकूमत जागीर
  3. भौम की जागीर
  4. सासण जागीर

भौम की जागीर राज्य को अपनी सेवायें देते थे, और कुछ निश्चित कर देते थे। सासण जगीर-धर्मार्थ, शिक्षण कार्य, साहित्य लेखन कार्य चारण व भाट आदि को अनुदान स्वरूप दी जाती यह माफी जागीर भी कहलाती थी क्योंकि यह कर मुक्त जागीर होती थी। हुकूमत जागीर- यह मुत्सदद्धियों को दी जाती थी परगने के हाकिम का उत्तरदायित्व था कि वह लगान राजकोष में जमा कराये यह वेतन के रूप में दी गई जागीर होती थी, जो उस जागीरदार की मृत्यु के बाद खालसा कर दी जाती थी। सामन्त जागीर जन्मजात जागीर थी, इसका लगान सामन्त द्वारा वसूल किया जाता था “भूमि दो प्रकार की होती थी – कृषि भूमि और चरनोता भूमि। कृषि भूमि वह थी जो कि खेती योग्य हो, और चरनोता भूमि पर पशुओं के लिये चारा उगाया जाता था, जिसे आधुनिक राजस्व भाषा में चरागाह या गोचर भूमि कहा जाता है। वस्तुतः चरनोत भूमि सार्वजनिक भूमि थी।

राजस्थान की मध्यकालीन भू राजस्व व्यवस्था |किसान/ कृषक :

कृषक मुख्यतः दो प्रकार के होते थे- बापीदार और गैरबापीदार, बापीदार किसान को खुदकाश्तकार भी कहते थे, यह वह किसान होते थे जो खेती की जाने वाली भूमि का स्थाई स्वामी होता था, वह जोत के लिये आवश्यक सामग्री जुटा सके, किसान लम्बे समय से वहाँ रह रहा हो। गैरबापीदार को शिकमी काश्तकार भी कहते थे, इन्हे वंशानुगत अधिकार प्राप्त नहीं थे भूमि के स्वामी नहीं थे, ये खेतीहर मजदूर थे। बापीदार किसानों को कई रियासतें थी – – उनके खेत की लकड़ी और कुओं पर उनका स्वामित्व था, – कर निर्धारण के समय यह ध्यान रखा जाता था कि कृषि उत्पादन बढ़ाने के लिये बापीदार ने किन साधनों का उपयोग किया है। – बापीदार किसानों के भू-स्वामित्व को तत्काल समाप्त नहीं किया जा सकता था, यदि दुर्भिक्ष के समय किसान गाँव छोड़कर कुछ अवधि के लिये बाहर चला जाता था तब भी भूमि किसान की ही रहती थी, पुनः लौटने पर किसान अपनी भूमि को जोत सकता था। स्पष्ट है कि भूमि पर किसानों का स्वामित्व था। राजस्थान में प्रचलित एक कहावत का कर्नल जेम्स टॉड ने उल्लेख कर शासक कृषक भू-राजस्व पर प्रकाश डाला है, कहावत थी- “भोग रा धणी राज हो, भोम रा धणी मा छौ। अर्थात भूमि (भौम) को मालिक जोतने वाला और राजा राजस्व (भोग) का अधिकारी। किसानो को दी जाने वाली भूमि का पट्टा जागीरदार के रजिस्टर में दर्ज रहता था, जिसे दाखला कहते थे।

भरतपुर रियासत में राजा सूरजमल के समय कृषि की उन्नति हेतु दृढ़ नीति निर्धारित की गई, फलस्वरूप राजा सूरजमल के शासन के अन्तिम वर्ष 1763 ई. में भरतपुर राज्य की कृषि से आय 17.5 लाख रुपये प्रतिवर्ष थी। कृषि से होने वाली आय में से बड़ी धन राशि उसने शिक्षा और साहित्य के विकास में लगाया। राजा सूरजमल की मान्यता थी कि यदि राज्य आर्थिक दृष्टि से सम्पन्न एवं सुदृढ़ है तो खराब से खराब समय में भी राज्य मजबूत बना रह सकता है। राजा सूरजमल द्वारा स्थापित मजबूत कृषि नीति भरतपुर की प्रगति में सहायक सिद्ध हुई।

लगान निर्धारण :

भूमि स्वामित्व के बाद उस पर लगान वसूली करना महत्त्वपूर्ण उत्तरदायित्व था, भू राजस्व को लगान, भोग हांसिल, और भोज आदि कहा जाता था। लगान निर्धारण अलग-अलग रियासतों में भिन्नता लिये हुए थे, उस रियासत के सामन्त और जागीरदार उसी रियासत की परम्परा के अनुसार लगान निध परिण करते थे प्रचलित विभिन्न व्यवस्थाओं में मुख्यतः तीन प्रकार की कर निर्धारण व्यवस्था उभरती है

प्रथम भूमि का स्वरूप यह दो भागो में विभक्त थी – बारानी अर्थात् बरसात के पानी से सिंचित भूमि ओर उन्नाव अर्थात् जो भूमि तालाब, कुओं, बावड़ियों आदि से सिंचित की जाती हो। दूसरा निर्धारण तत्त्व फसल की विशेषता थी, दो बातों को ध्यान में रखकर राजस्व निर्धारण किया जाता था बाजार भाव और भूमि की उत्पादकता की क्षमता, तीसरा काश्तकार की जाति इस सम्बन्ध में यह मान्यता थी कि राजपूतो और विश्नोइयों की अपेक्षा जाटों से अधिक कर लिया जाता था। राजपूत, ब्राह्यण और महाजन किसानों को भू राजस्व में विशेष छुट दी जाती थी। खरीफ और रबी की फसलों पर भी लगान की दरे भिन्न भिन्न होती थी, लगान निर्धारण एवं वसूली के समय पटेल या चौधरी की भूमिका महत्वपूर्ण होती थी। यह सरकार और कृषक के मध्य मध्यस्तर के रूप में निगरानी में कार्य सम्पादित कराते थे, पटेल या चौधरी सरकारी कर्मचारी नहीं होते थे।

लगान वसूली की विधि :

शासक, सामन्त, जागीरदार एवं अधिकारी कृषकों से लगान वसूली के तीन प्रकार की विधि को अपनाते थे:

1. लाटा या बटाई विधि

  • इसमें फसल कटने योग्य होने पर लगान वसूली के लिये नियुक्त अधिकारी की देखरेख में फसल की कटाई की जाती थी।
  • धान साफ होने के बाद फसल में से राजस्व के लिये दिये जाने वाला भाग तोल कर अलग कर दिया जाता।

कुन्ता विधि

  • इस विधि के अनुसार खड़ी फसल को देखकर अनुमानित लगान निर्धारित करना। कुन्ता विधि में तोल या माप नहीं किया जाता था।

अन्य प्रणाली

इसे तीन भागों में विभक्त किया जा सकता है – मुकाता, डोरी और घूघरी।

  • डोरी, मुकाता में कर निर्धारण एक मुश्त का निर्धारण करता था नकद कर भी लिया जाता था।
  • डोरी कर निर्धारण में नापे गये भू भाग का निर्धारण करके कर वसूल करना।
  • घूघरी कर विधि के अनुसार शासक, सामन्त एवं जागीरदार किसान को जितनी घूघरी अर्थात् बीज देता था, उतना ही अनाज लगान के रूप में लेता था।
  • दूसरी घूघरी विधि के अनुसार प्रति कुआं या खेत की पैदावर पर निर्भर था।

मध्यकालीन भू राजस्व में किसान पूर्ण सुरक्षित स्थिति में थे, ये आत्मनिर्भर ग्रामीण अर्थव्यवस्था के विकास का युग माना जाता है क्योकि किसान भू-स्वामी था, अकाल के समय उसे लगान से छूट मिलती थी, पशुओं के लिये चरागाह भूमि छोड़ी जाती थी, उस पर सामूहिक अधिकार होता, शासक उसे खालसा नहीं कर सकता था, और चरनोत भूमि पर शिकार करने का अधिकार किसी को नहीं था, भूमि एवं लगान सम्बन्धित विवाद ग्राम पंचायत में सुलझाये जाते थे। मध्यकालीन सामन्तवाद पर आधारित यह प्रशासनिक व्यवस्था ब्रिटिश सर्वोच्चता काल में नई प्रशासनिक संस्थाओं के उदय के साथ कमजोर होती गई और 1947 में स्वतन्त्र भारत में राजस्थान के एकीकरण के बाद मध्यकालीन प्रशासनिक व्यवस्था समाप्त हो गई।

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