राजस्थान महामारी अध्यादेश 2020

राजस्थान महामारी अध्यादेश 2020

महामारी के विनियमन और रोकथाम से संबंधित विधियों को समेकित करने के लिए और उससे संसक्त या आनुषंगिक विषयों के लिए, भारत के संविधान के अनुच्छेद 213 के खण्ड (1) द्वारा प्रदत्त शक्तियों का प्रयोग करते हुए, राज्यपाल महोदय द्वारा 1 मई, 2020 को राजस्थान महामारी अध्यादेश 2020 बनाया तथा प्रख्यापित किया गया ।

राजस्थान राज्य विधान सभा सत्र में नहीं है और राजस्थान राज्य के राज्यपाल का यह समाधान हो गया है कि ऐसी परिस्थितियां विद्यमान हैं जिनके कारण तुरन्त कार्रवाई करना उनके लिए आवश्यक हो गया है |

1. संक्षिप्त नाम, प्रसार और प्रारम्भ-

  • (1) इस अध्यादेश का नाम राजस्थान महामारी अध्यादेश 2020
  • (2) इसका प्रसार सम्पूर्ण राजस्थान राज्य में होगा।
  • (3) यह तुरन्त प्रवृत्त होगा।

2. राजस्थान महामारी अध्यादेश 2020 परिभाषाएं-

(1) इस अध्यादेश में, जब तक कि संदर्भ से अन्यथा अपेक्षित न हो,

  • (क) “महामारी” से सरकार द्वारा राजपत्र में प्रकाशित अधिसूचना द्वारा महामारी के रूप में घोषित कोई रोग अभिप्रेत है;
  • (ख) “सरकार” से राजस्थान सरकार अभिप्रेत है;
  • (ग) “विनियम” से इस अध्यादेश के अधीन बनाये गये विनियम अभिप्रेत हैं;
  • (घ) “नियम” से इस अध्यादेश के अधीन बनाये गये नियम अभिप्रेत हैं;
  • (ङ) “राज्य” से राजस्थान राज्य अभिप्रेत है।

भाग 4 (ख) (2) ऐसे शब्द और अभिव्यक्तियां, जो इसमें प्रयुक्त की गयी हैं और परिभाषित नहीं की गयी हैं, किन्तु राजस्थान साधारण खण्ड अधिनियम, 1955 (1955 का अधिनियम सं. 8) में परिभाषित की गयी हैं, का क्रमश: वही अर्थ होगा जो उन्हें उस अधिनियम में समनुदेशित किया गया है।

3. महामारी को अधिसूचित करने की सरकार की शक्ति-

सरकार, इस अध्यादेश के प्रयोजनों के लिए, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, किसी भी रोग को या तो सम्पूर्ण राज्य में या उसके ऐसे भाग या भागों में, जो अधिसूचना में विनिर्दिष्ट किया जाये, महामारी के रूप में अधिसूचित कर सकेगी।

4. महामारी के संबंध में विशेष उपाय करने और विनियम विनिर्दिष्ट करने की शक्ति-

जब, राज्य सरकार का किसी भी समय यह समाधान हो जाये कि राज्य या उसके किसी भाग में किसी महामारी का प्रकोप हआ है या होने की आशंका है तब सरकार, ऐसे उपाय कर सकेगी जो वह इस प्रयोजन के लिए आवश्यक समझे, और जनता द्वारा या किसी व्यक्ति द्वारा या व्यक्तियों के किसी वर्ग द्वारा अनुपालन किये जाने के लिए, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा ऐसे अस्थायी विनियम या आदेश विनिर्दिष्ट कर सकेगी ताकि ऐसे रोग के प्रकोप या उसके प्रसार की रोकथाम की जा सके और जिला कलक्टरों से ऐसी शक्तियों और कर्तव्यों का, जैसाकि उक्त विनियमों या आदेशों में विनिर्दिष्ट किया जाये, प्रयोग और पालन करने की अपेक्षा कर सकेगी या उन्हें सशक्त कर सकेगी।

(2) विशिष्टतया और पूर्वगामी उपबंधों की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, सरकार निम्नलिखित के लिए उपाय कर सकेगी और विनियम विनिर्दिष्ट कर सकेगी,

  • (क) किसी प्रथा या कृत्य को जिसे सरकार राज्य में किसी जमाव समारोह उपासना या ऐसे अन्य क्रियाकलापों से व्यक्ति से व्यक्ति में महामारी के प्रसार या फैलने के लिए पर्याप्त समझे ,प्रतिषिद्ध करना;
  • (ख) विनियम या आदेशों में प्राधिकृत अधिकारी द्वारा राज्य में वायु रेल, सड़क मार्ग या अन्य किसी साधनों से पहुंचने वाले या चिकित्सालय, अस्थायी आवास, घर में क्वारंटीन में या, यथास्थिति, आइसोलेशन में रखे गये व्यक्तियों का या अन्यथा ऐसे किसी रोग के संक्रमण के संदिग्ध व्यक्तियों का निरीक्षण करना;
  • (ग) राज्य की सीमाओं को ऐसी कालावधि के लिए, जो आवश्यक समझी जाये, सील करना;
  • (घ) लोक और निजी परिवहन के प्रचालन पर निबंधन अधिरोपित करना;
  • (ङ) सामाजिक दूरी के मानक या जनता द्वारा अनुपालन किये जाने के अन्य कोई अनुदेश, जो कि इस महामारी के कारण लोक स्वास्थ्य और सुरक्षा के लिए आवश्यक समझे जायें, विहित करना; (च) सार्वजनिक स्थानों पर और धार्मिक संस्थाओं या उपासना स्थलों में व्यक्तियों के एकत्रित होने को निर्बंधित या प्रतिषिद्ध करना;
  • (छ) राज्य में सरकारी और निजी कार्यालयों और शैक्षणिक संस्थाओं के कामकाज को विनियमित या निर्बधित करना;
  • (ज) दुकानों और वाणिज्यिक और अन्य कार्यालयों, स्थापनों, कारखानों, कार्यशालाओं और गोदामों के कामकाज पर प्रतिषेध या निबंधन अधिरोपित करना;
  • (झ) आवश्यक सेवाओं या आपातकालीन सेवाओं जैसेकि बैंक मीडिया स्वास्थ्य सेवा खाद्य आपूर्ति, विद्युत, जल ईंधन, इत्यादि की समयावधि को निर्बंधित करना; और
  • (ञ) ऐसे अन्य उपाय करना, जो महामारी के विनियमन और रोकथाम के लिए आवश्यक हों और सरकार द्वारा विनिश्चित किये जायें।

5. अपराधों के लिए दण्ड-

कोई व्यक्ति/संस्था/कंपनी जो विनियमों या आदेशों द्वारा आबद्ध है, इस अध्यादेश के अधीन बनाये गये ऐसे किसी विनियम या आदेश का उल्लंघन या उसकी अवज्ञा करता है या इस अध्यादेश के अधीन सशक्त किसी अधिकारी को बाधा पहुंचाता है, दोषसिद्धि पर, ऐसे कारावास से, जिसकी अवधि दो वर्ष तक की हो सकेगी या जुर्माने से, जो दस हजार रुपये तक का हो सकेगा या, दोनों से, दंडनीय होगा।

6. अपराधों के दुष्प्रेरण के लिए दण्ड-

जो कोई इस अध्यादेश के अधीन किसी अपराध का दुष्प्रेरण करता है वह उसी रीति से दण्डित किया जायेगा मानो वह अपराध उसने स्वयं कारित किया है।

7. कंपनी द्वारा अपराध-

(1) जहां इस अध्यादेश के अधीन कोई अपराध किसी कंपनी द्वारा कारित किया गया है, वहां ऐसा प्रत्येक व्यक्ति, जो अपराध के कारित किये जाने के समय उस कंपनी के कारबार के संचालन के लिए उस कंपनी का प्रभारी था, और उसके प्रति उत्तरदायी था, और साथ ही वह कंपनी भी, उस अपराध के दोषी समझे जायेंगे और तदनुसार अपने विरुद्ध कार्यवाही किये जाने और दण्डित किये जाने के दायी होंगेः

परन्तु इस उप-धारा में अंतर्विष्ट कोई भी बात किसी ऐसे व्यक्ति को किसी भी दण्ड के लिए दायी नहीं बनायेगी यदि वह यह साबित कर देता है कि अपराध उसकी जानकारी के बिना कारित किया गया था या उसने ऐसे अपराध के किये जाने को निवारित करने के लिए सब सम्यक् तत्परता बरती थी।

(2) उप-धारा (1) में अंतर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी, जहां इस अध्यादेश के अधीन कोई अपराध किसी कंपनी द्वारा कारित किया गया है और यह साबित हो जाता है कि वह अपराध कंपनी के किसी निदेशक, प्रबंधक, सचिव या अन्य अधिकारी की सहमति या मौनानुकूलता से कारित किया गया है या उसकी उपेक्षा के फलस्वरूप कारित किया गया माना जा सकता है तो ऐसा निदेशक, प्रबन्धक, सचिव या अन्य अधिकारी अपने विरुद्ध कार्यवाही किये जाने और तदनुसार दण्डित किये जाने का दायी होगा।

स्पष्टीकरण- इस धारा के प्रयोजनों के लिए,

  • (क) “कंपनी” से कोई निगमित निकाय अभिप्रेत है, और इसमें कोई फर्म या व्यष्टियों का अन्य संगम सम्मिलित है; और
  • (ख) फर्म के संबंध में “निदेशक” से फर्म का भागीदार अभिप्रेत है।

8. अपराधों का संज्ञेय और जमानतीय होना-

दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1973 (1974 का केन्द्रीय अधिनियम सं. 2 में अंतर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी इस अध्यादेश के अधीन समस्त अपराध संज्ञेय और जमानतीय होंगे।

9. प्राधिकृत अधिकारी-

तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि में अंतर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी, राज्य सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, एक या अधिक व्यक्तियों को प्राधिकृत कर सकेगी, जो इस अध्यादेश के अधीन कार्य करने के लिए सक्षम होंगे।

10. प्रत्यायोजित करने की शक्ति-

राज्य सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, निदेश दे सकेगी कि इस अध्यादेश के अधीन उसके द्वारा प्रयोग की जा सकने वाली कोई शक्ति ऐसी शर्तों, यदि कोई हों, के अध्यधीन रहते हुए, जो उसमें विनिर्दिष्ट की जायें, ऐसे अधिकारी, जो उसमें उल्लिखित किया जाये, द्वारा भी प्रयोग की जा सकेगी।

11. अपराधों का शमनीय होना-

इस अध्यादेश के अधीन दण्डनीय अपराधों का, या तो अभियोजन के संस्थित किये जाने से पूर्व या पश्चात्, ऐसे प्राधिकारियों या अधिकारियों द्वारा और ऐसी रकम के लिए, जैसाकि राज्य सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, इस निमित्त विनिर्दिष्ट करे, शमन किया जा सकेगा।

12. अध्यादेश का किसी भी अन्य विधि के अल्पीकरण में न होना-

इस अध्यादेश के उपबंध तत्समय प्रवृत्त किसी भी अन्य विधि के उपबंधों के अतिरिक्त होंगे न कि उसके अल्पीकरण में।

13. सद्भावपूर्वक की गयी कार्रवाई के लिए संरक्षण-

इस अध्यादेश के द्वारा या उसके अधीन सद्भावपूर्वक की गयी या किये जाने के लिए आशयित किसी बात के लिए, किसी भी व्यक्ति के विरुद्ध कोई वाद, अभियोजन या अन्य विधिक कार्यवाही नहीं होगी।

14. कठिनाइयों के निराकरण की शक्ति-

यदि इस अध्यादेश के उपबंधों को प्रभावी करने में कोई कठिनाई उत्पन्न होती है तो राज्य सरकार, राजपत्र में प्रकाशित आदेश द्वारा ऐसे उपबंध कर सकेगी, जो इस अध्यादेश के उपबंधों से असंगत न हों और जो कठिनाई के निराकरण के लिए आवश्यक प्रतीत हों।

15. नियम बनाने की शक्ति-

(1) सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, इस अध्यादेश के उपबंधों को कार्यान्वित करने के प्रयोजन के लिए, भविष्यलक्षी या भूतलक्षी प्रभाव से नियम बना सकेगी।

(2) इस अध्यादेश के अधीन बनाया गया प्रत्येक नियम और विनियम, उसके इस प्रकार बनाये जाने के पश्चात् यथाशक्य शीघ्र, राज्य विधान-मण्डल के सदन के समक्ष, जब वह सत्र में हो, चौदह दिवस से अन्यून की कल कालावधि के लिए, जो एक सत्र में या दो या अधिक उत्तरोत्तर सत्रों में समाविष्ट हो सकेगी, रखा जायेगा और यदि उस सत्र की, जिसमें वह इस प्रकार रखा गया है, या ठीक अगले सत्रों की समाप्ति के पूर्व राज्य विधानमण्डल का सदन ऐसे किसी नियम या विनियम में कोई उपान्तरण करता है या यह संकल्प करता है कि ऐसा नियम या विनियम नहीं बनाया जाना चाहिए तो तत्पश्चात् ऐसा नियम या विनियम केवल ऐसे उपांतरित रूप में प्रभावी होगा या, यथास्थिति, उसका कोई प्रभाव नहीं होगा तथापि, ऐसा कोई भी उपांतरण या बातिलकरण उसके अधीन पूर्व में की गयी किसी बात की विधिमान्यता पर कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं डालेगा।

16. निरसन और व्यावृत्तियां-

(1) राजस्थान संक्रामक रोग अधिनियम, 1957 (1957 का अधिनियम सं. 31) इसके द्वारा निरसित किया जाता है।

(2) ऐसे निरसन के होने पर भी, उक्त अधिनियम के अधीन की गयी समस्त बातें, कार्रवाइयां या किये गये आदेश इस अध्यादेश के अधीन किये गये समझे जायेंगे।

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