राजस्थान में बकरी

राजस्थान में बकरी

राजस्थान में बकरी | बकरी को भविष्य का पशु कहा जाता है। बकरी पालन में राजस्थान का देश में प्रथम स्थान है। भारत की समस्त बकरियों (148. 88 मिलियन) का 13.99 प्रतिशत भाग राजस्थान में पाया जाता है। तथा राजस्थान की कुल पशु-सम्पदा में बकरियों की संख्या 36. 69 प्रतिशत है। केन्द्रीय बकरी अनुसंधान केन्द्र अविकानगर, टोंक में स्थित है।

राजस्थान में बकरी

राजस्थान में पाई जाने वाली बकरी की प्रमुख नस्ले इस प्रकार है:

सिरोही

  • सिरोही बकरी दोहरी प्रकार की नस्ल है। इसका उपयोग दूध और मांस के लिए किया जाता है।
  • इस नस्ल में रोग प्रतिरोधक क्षमता एवं सूखा सहन करने की क्षमता अन्य बकरियों की अपेक्षा अधिक होती है।
  • इस नस्ल के पशु का आकार मध्यम एवं शरीर गठीला होता है। इसके शरीर का रंग हल्का एवं गहरा भूराव शरीर पर काल, सफद एवं गहरे काले रंग के धब्बे होते हैं।
  • प्रमुख क्षेत्र – यह नस्ल राजस्थान में अरावली पर्वतमालाओं के आसपास के क्षेत्रों में तथा सिरोही, अजमेर, नागौर, टोंक, राजसमंद एवं उदयपुर जिलों में मुख्य रूप से पायी जाती हैं।
  • सिरोही बकरी सुधार पर अखिल भारतीय समन्वित अनुसंधान परियोजना (सिरोही बकरी), पशुधन अनुसंधान स्टेशन, वल्लभनगर, उदयपुर और पशुधन अनुसंधान स्टेशन, बोजुंडा, चित्तौड़गढ़ स्थापित है। इसकी एक उन्नत इकाई केन्द्रीय भेड़ एवं अनुसंधान संस्थान अविकानगर में भी है।
  • पशुधन अनुसंधान स्टेशन, बीछवाल, में “सिरोही बकरी प्रजनन परियोजना” चलाई जा रही है

मारवाड़ी

  • यह मध्यम आकार की काले रंग की बकरी है।
  • इसका शरीर लम्बे बालों से ढका होता है। इनके शरीर से वर्ष में औसतन 200 ग्राम बालों की प्राप्ति होती है जो गलीचे/नमदा आदि बनाने के काम आते हैं।
  • प्रमुख क्षेत्र – यह नस्ल राजस्थान में जोधपुर, पाली, नागौर, बीकानेर, जालौर, जैसलमेर व बाड़मेर जिलों में पायी जाती हैं।
  • मारवाड़ी बकरी नस्ल सुधार के लिए बीकानेर, राजस्थान में आईसीएआर प्रायोजित “अखिल भारतीय समन्वित अनुसंधान परियोजना (बकरी सुधार पर एआईसीआरपी) के तहत मारवाड़ी बकरी का रखरखाव किया जाता है।

जखराना

  • यह आकार में बड़ी तथा काले रंग की होती है। इनके मुँह व कानों पर सफेद रंग के धब्बे पाये जाते हैं।
  • प्रमुख क्षेत्र – यह नस्ल राजस्थान के अलवर जिले एवं आस पास के क्षेत्रों में पायी जाती है।

जमनापारी

  • यह एक बड़े आकार की बकरी है। इसका रंग सफ़ेद होता है। और कभी-कभी गले व सिर पर धब्बे भी पाये जाते हैं। इनकी नाक उभरी हई होती है जिसे रोमन नोज कहते है। इस पर बालों के गुच्छे होते हैं। रोमन नोज एवं जांघों के पिछले भाग में सफेद बाल इस नस्ल की मुख्य पहचान है।
  • यह नस्ल मुख्य रूप से उत्तर प्रदेश के इटावा जिले के चकरनगर व गढ़पुरा इलाके में बहुतायत से पायी जाती हैं। यह क्षेत्र यमुना व चम्बल नदियों के कछार में स्थित है।
  • ये बकरियाँ, बीहड़ व खादर क्षेत्रों में जहाँ पर चराई की अच्छी सुविधा उपलब्ध हो तो खूब पनपती हैं।
  • यह एक दुकाजी नस्ल है परन्तु इससे दूध उत्पादन सबसे अधिक प्राप्त किया जाता है।
  • प्रमुख क्षेत्र – कोटा, बूंदी, झालावाड़

बकरियों में होने वाले मुख्य रोग

अ. जीवाणु जनित रोग

  • न्यूमोनिआ
  • एन्ट्रोटॉक्सीमिआ/फिड़किया रोग(जहरीले दस्त) – क्लोस्ट्रिडियम जीवाणु द्वारा
  • फुट रोग (खुरों का रोग)
  • ब्रुसलोसिस (संक्रामक गर्भपात)
  • गलघोंटू (हीमोरैजिक सेप्टिसिमीआ)
  • जोन्स रोग (आँतों की T. B. ) – माइक्रोबैक्टीरिया पैराट्यूबरक्लोसिस द्वारा
  • थनैला रोग (थनों में होने वाला रोग )

ब. विषाणु जनित रोग

  • कंटेजियस एक्थाइमा (मोहा)
  • खुरपका मुहपका (F. M. D)
  • नील सर्ना (ब्लूटंग) रोग – क्यूलिकवाइडस मच्छर द्वारा
  • बकरी प्लेग (P. P. R.) – मोरबिली वायरस द्वारा

स. परजीवी जनित रोग

  • पेराएम्फीस्टोमीयसिस
  • फेसीओलिएसिस
  • सिस्टोसोमिएसिस
  • टीनिएसिस
  • गिड
  • बेबेसिओसिस – कीलनियों, चीचड़ों द्वारा

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