पश्चिमी मरूस्थलीय प्रदेश

पश्चिमी मरूस्थलीय प्रदेश

पश्चिमी मरूस्थलीय प्रदेश : राजस्थान में अरावली पर्वत श्रेणियों के पश्चिम में विस्तृत मरूस्थल भौगोलिक प्रदेश है जिसे मरूस्थल, अथवा ‘थार का मरूस्थल’ के नाम से जाना जाता है। इस प्रदेश का विस्तार राज्य में 25° उत्तरी से 30° उत्तरी अक्षांश और 69°30° पूवी से 70°45° पूर्वी देशान्तर के मध्य है।

  • इसके अन्तर्गत राज्य के 12 जिले – बाड़मेर, जोधपुर, जैसलमेर, बीकानेर, गंगानगर, हनुमानगढ़, जालौर, पाली, नागौर चूरू, झुन्झुनूं, सीकर आते हैं |
  • राजस्थान में थार मरुस्थल का लगभग 62 प्रतिशत भाग आता है एवम् मराज्य का लगभग 61.11 प्रतिशत हिस्सा बालुका मैदान या मरुस्थल है।
  • इस प्रदेश में राज्य की 40 प्रतिशत जनसंख्या निवास करती है।
  • सामान्य ढाल पूर्व से पश्चिम तथा उत्तर से दक्षिण की और रेतीले शुष्क मैदान एवं अर्द्धशुष्क मैदान को विभाजित करने बाली रेखा 25 सेमी. वर्षा रेखा है। जिसके आधार पर दो भागों में विभक्त हैं|
    • अ. – पश्चिम विशाल मरूस्थल या रेतीला शुष्क मैदान
    • ब. – राजस्थान बांगर (बांगड) या अर्द्ध शुष्क मैदान

अ. – पश्चिम विशाल मरूस्थल या रेतीला शुष्क मैदान

  • वर्षा का वार्षिक औसत 20 से. मी.
  • क्षेत्र – बाडमेर, जैसलमेर, गंगानगर, चूरू।
  • कम वर्षा के कारण- यह प्रदेश “शुष्क बालूका मैदान” भी कहलाता है।
  • इस मैदान को दो भागों में बांटा जाता है
    • अ.1 – बालूका स्तूप युक्त मरूस्थलीय प्रदेश
    • अ.2 – बालुका स्तूप मुक्त क्षेत्र
अ.1 – बालूका स्तूप युक्त मरूस्थलीय प्रदेश
  • बालू के टीले।
  • ये क्षेत्र वायु अपरदन एवं निक्षेपण का परिणाम है।
  • यहाँ निम्न बालुका स्तूपों का बाहुल्य है
    • पवनानुवर्ती बालुका स्तूप– जैसलमेर, जोधपुर, बाडमेर में इन पर बनस्पति पाई जाती है।
    • बरखान या अर्द्ध चन्द्राकार बालुका स्तूप – चूरू, जैसलमेर, सीकर, लुणकरणसर, सूरतगढ, बाड़मेर, जोधपुर आदि। ये गतिशील, रंध्रयुक्त, व नबीन बालुयुक्त होते है।
    • अनुप्रस्थ बालुका स्तूप – बीकानेर, द, गंगानगर, हनुमानगढ़, चूरू, सूरतगढ़, झंझनू. ये पवन की दिशा में समकोण पर बनते है।
    • पैराजोलिक बालुका स्तूप – सभी मरूस्थली जिलों में विद्यमान, निर्माण-वनस्पति एवं समतल मैदानी भाग के बीच उत्पादन से आकृति-हेयरपिननुमा।
    • ताराबालका स्तुप – मोहनगढ, पोकरण (जैसलमेर), सुरतगद (गंगानगर), निर्माण- अनियतवादी एवं संश्लिष्ट पवनों के क्षेत्र में।
    • नेटवर्क बालुका स्तूप – हनुमानगढ़ से हिसार तक।
अ.2 – बालुका स्तूप मुक्त क्षेत्र
  • पूर्वी भाग में स्थित
  • इसे जैसलमेर-बाड़मेर का चट्टानी क्षेत्र भी कहते है।
  • टर्शियरी व प्लीस्टोसीन काल की परतदार चट्टानों का बाहुल्य।
  • टेथिस के अवशेष वाले चट्टानी समूह। – चूना पत्थर की चट्टाने मुख्य।
  • इनमें वनस्पति अवशेष व जीवाश्म पाये जाते है। उदाहरण जैसलमेर के राष्ट्रीय मरूउद्यान में स्थित आकल बुड फॉसिल पार्क।
  • इसी प्रदेश की अवसादी शैलों मे भूमिगत जल का भारी भण्डार लाठी सीरीज क्षेत्र इसी भूगर्भीय जल पट्टी का उदाहरण है।
  • टर्शियरीकालीन चट्टानों मे गैस-खनिज तेल के व्यापक भण्डार बाडमेर (गुडामालानी, बायतु) में एवं जैसलमेर में तेल व गैस के व्यापक भण्डार।

ब. – राजस्थान बांगर (बांगड) या अर्द्ध शुष्क मैदान

  • यह आंतरिक प्रवाह क्षेत्र शुष्क रेतीले प्रदेश के पूर्व में एवं अरावली पहाड़ियों के पश्चिम में लूनी नदी के जल प्रवाह क्षेत्र में अवस्थित है।
  • राजस्थान बांगर (बांगड) या अर्द्ध शुष्क मैदान को 4 भागों में विभक्त किया जाता है।
    • 1 – घग्घर का मैदान
    • 2 – शेखावाटी प्रदेश
    • 3 – नागौरी उच्च भूमि
    • 4 – लूनी- जवाई बेसीन
ब.1 – घग्घर का मैदान
  • निर्माण-घग्घर, वैदिक सरस्वती, सतलज एवं चौतांग नदियों को जलोढ़ मिट्टी से
  • विस्तार- हनुमानगढ़, गंगानगर।
  • घग्घर नदी के घाट को “नाली” कहते है।
  • वर्तमान- मृत नदी नाम से विख्यात।
  • वर्षा ऋतु में बाढ़ आने पर हनुमानगढ़ में जलमग्न।
  • भटनेर के पास रेगिस्तान में विलुप्त।
ब.2 – शेखावाटी प्रदेश
  • आंतरिक प्रवाह क्षेत्र
  • चूरू, सीकर, झंशन व नागौर का कुछ भाग।
  • बरखान स्तूपों का बाहुल्य।
  • नदिया- कांतली मेथा, रूपनगढ़, खारी इत्यादि।
ब.3 – नागौरी उच्च भूमि
  • बांगड का मध्यवर्ती भाग, जहां नमक युक्त झीले, अंतर्मवाह, जलक्रम, प्राचीन चट्टाने एवं ऊंचा-नीचा धरातल मौजूद।
  • वहा डीड़वाना, कुचामन, सांभर, डिंगाना झीलें।
  • यहां माइकाशिष्ट नमकीन चट्टानें, जिनसे केशिकाव के कारण नमक सतह पर आता रहता है।
ब.4 – लूनी- जवाई बेसीन
  • लूनी व सहायक नदियों का अपवाह प्रदेश।
  • इसमें जोधपुर, जालौर, पाली एवं सिरोही शामिल।
  • इस क्षेत्र में जालौर- सिवाना पहाड़िया स्थित जो ग्रेनाइट के लिए प्रसिद्ध है।
  • मालाणी पहाड़िया व चूना पत्थर की चटवाने भी स्थित।
  • बालोतरा के बाद लूनी नदी का पानी नमकयुक्त चट्टानों, नमक कणों एवं मरूस्थलीय प्रदेश के अपवाह तंत्र के कारण खारा हो जाता है।
  • यहां जसवंत सागर/पिचियाक बांध, सरदारसमंद, हेमावास बांध, एवं नयागांव आदि बांध।

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