राजस्थान के लोकनाट्य

राजस्थान के लोकनाट्य

राजस्थान के लोकनाट्य

लोकनाट्य जनसाधारण के मनोरंजन के लिए जनसाधारण के द्वारा अभिनीत होते हैं। इनका रंगमच खुला होता है। गांव का चौराहा, किसी देवालय का चबूतरा या कोई बड़ा आंगन ही इनके अभिनीत होने का स्थान है। लोकनाट्यों के कथानक जनसाधारण में प्रचलित एवं उनकी रुचि के होते है जैसे ढोला मारु, हीर-रांझा, वीर दुर्गादास, अमरसिंह राठौड़, सुल्तान निहालदे आदि लोककथाएं।राजस्थान के लोकनाट्य बहुरूपी और बहुरंगी हैं।

  • अरावली के पर्वतीय क्षेत्र के लोकनाट्यों में भील, मीणा, बनजारा, सहरिया और गरासिया जनजाति की रंगमयी संस्कृति की झलक देखी जा सकती है। जिस पर इनके प्राकृतिक परिवेश तथा देवी-देवताओं में आस्था जीवन्त नृत्यों, नाट्यों तथा रंगीन परिधान में डूबी संस्कृति का आख्यान होता है।
  • राजस्थान के मरूस्थलीय क्षेत्रों में लोकनाट्यों के माध्यम से मनोरंजन का कार्य सरगड़ा, नट, मिरासी, भाट व भाण्ड नामक पेशेवर जातियों के लोग करते हैं। इनके वार्तालाप व्यंग्य विनोद प्रधान होते हैं।
  • अलवर, भरतपुर क्षेत्र के लोक नाट्यों में राजस्थान, हरियाणा और उत्तरप्रदेश की लोक संस्कृतियों का मिला-जुला रूप दिखाई देता है।
  • धौलपुर, सवाईमाधोपुर आदि क्षेत्रों के लोक नाट्यों पर ब्रजभूमि की संस्कृति का प्रभाव स्पष्ट झलकता है।

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राजस्थान में लोक नाट्यों के निम्नांकित रूप प्रचलित हैं:-

राजस्थान के लोकनाट्य : ख्याल

ख्याल 18वीं सदी की शुरुआत से ही राजस्थान के लोक नाट्यों में शामिल थे। इसमें ऐतिहासिक एवं पौरागणिक कहानियों पर संगीत के माध्यम से अभिनय किया जाता है। ख्याल के सूत्रधार को हलकारा कहा जाता है। ख्याल में भाग लेने वाले को खिलाडी व इसके मुखिया को उस्ताद कहते है। ख्याल प्रतियोगिता को दंगल कहा जाता है। भौगोलिक अंतर के कारण इन ख्यालों ने विभिन्न रूप ग्रहण कर लिये है। इनमें भाषागत के स्थान पर शैलीगत भिन्नता पायी जाती है। इन ख्यालों में से कुछ की विशेषताएं निम्न प्रकार हैं

कुचामनी ख्याल

प्रवर्तक – लच्छीराम
मुख्य कलाकार – उगमराज
मुख्य कहानियां – मीरा मंगल, राव रिडमल, चांद नीलगिरी हैं।

कुचामनी ख्याल का प्रवर्तन प्रसिद्ध लोक नाट्यकार लच्छीराम ने किया। ख्याल परम्परा में उन्होंने अपनी शैली का समावेश किया। लच्छीराम द्वारा रचित ख्यालों में से चाँद नीलगिरी, राव रिड़मल तथा मीरा मंगल प्रमुख हैं। उगमराज, वंशीलाल चुई भी कुचामनी ख्याल के प्रमुख खिलाड़ी है।
कुचामनी ख्याल की मुख्य विशेषताएं:

  • इसका रूप ऑपेरा जैसा है।
  • इसमें लोकगीतों की प्रधानता है।
  • इसका प्रदर्शन खुले मंच पर किया जाता है।
  • इनमें स्त्री चरित्रों का अभिनय पुरुष पात्रों द्वारा किया जाता है।
  • इस ख्याल में संगत के लिए ढोल वादक, शहनाई वादक, ढोलक व सारंगी वादक मुख्य सहयोगी होते हैं।
  • इन ख्यालों की भाषा सरल होती है तथा सामाजिक व्यंग्य पर आधारित विषय चुने जाते हैं।

शेखावाटी ख्याल/ चिड़ावा ख्याल

शेखावाटी इलाके में नानूराम के शिष्य दूलिया राणा के ख्याल बहुत लोकप्रिय हैं। गीतमय संवाद उनके ख्यालों को साहित्यिक तथा रंगमंच के अनुकूल बनाते हैं। दूलिया राणा के परिवार के लोग ही इन ख्यालों में होने वाले व्यय का वहन करते हैं।

मुख्य खिलाडी – चिड़ावा निवासी नानूराम व उनके शिष्य दुलिया राणा
प्रमुख कहानियां – हीर राँझा, हरीचन्द, भर्तृहरि, जयदेव कलाली, ढोला मरवण और आल्हादेव

शेखावाटी ख्याल की मुख्य विशेषताएं:

  • प्रभावी पद संचालन।
  • सम्प्रेषणीय शैली में भाषा और मुद्रा में गीत गायन ।
  • वाद्य में प्रायः हारमोनियम, सारंगी, शहनाई, बाँसुरी, नक्कारा तथा ढोलक का प्रयोग होता है।

जयपुरी ख्याल

इस ख्याल का प्रचलन जयपुर एवं आस-पास के कस्बों में है। इसमें गुणीजनखाना के कलाकार भाग लेते थे। इस ख्याल की विशेषताएं निम्न है :

  • इसमें स्त्री पात्रों की भूमिकाएं स्त्रियां ही निभाती है।
  • जयपुरी ख्याल की शैली मुक्त तथा लचीली है अतः इसमें नये प्रयोगों की अत्यधिक संभावनाएं हैं।
  • इसमें समाचार पत्रों, कविता, संगीत, नृत्य, गान व अभिनय का सुन्दर समावेश मिलता है।
  • जयपुरी ख्याल के कुछ लोकप्रिय ख्याल जोगी-जोगन, कान-गूजरी, मियाँ-बीबू, पठान, रसीली तम्बोलन आदि हैं।

हेला ख्याल

हेला ख्याल दौसा, लालसोट व सवाईमाधोपुर क्षेत्र का प्रसिद्ध लोकनाट्य है। इस ख्याल के प्रमुख प्रेरक शायर हेला थे। बम (बड़ा नगाड़ा) के प्रयोग के साथ इस ख्याल का प्रारम्भ होता है। सुमरनी, चढ़ाव व टेर द्वारा हेला देते है साथ में नौबत बजाया जाता है। इस ख्याल की प्रमुख विशेषता ‘हेला देना’ (लम्बी टेर में आवाज देना) है।

कन्हैया ख्याल

कन्हैया ख्याल करौली, सवाई माधोपुर, धौलपुर, भरतपुर व दौसा क्षेत्र का प्रसिद्ध लोकनाट्य है। इसमें हेला ख्याल से मिलती-जुलती संगीत विद्या है। यह विद्या मूल रूप से मीणा जाती में प्रचलित थी। जिसमे अब अन्य जातियाँ जैसे गुजर, माली आदि के लोग भी भाग लेते है। यह ख्याल मई-जून माह में दिन में आयोजित की जाती है।
इस ख्याल में कही जाने वाली मुख्य कथा को ‘कहन‘ तथा मुख्य पात्र को ‘मेड़िया‘ कहते हैं। इसमें प्रयुक्त वाद्य यंत्र नोबत, घेरा, मंजीरा, ढोलक आदि है।

तुर्रा कलंगी ख्याल

  • प्रवर्तक-हिन्दू संत तुकनगरी, मुस्लिम संत शाहअली
  • मुख्य केन्द्र – घोसूण्डा, चित्तौड़, निम्बाहेड़ तथा नीमच (मध्य प्रदेश)
  • सर्वश्रेष्ठ कलाकार – सोनी जयदयाल, चेतराम, हमीद बेग, ताराचंद तथा ठाकुर ओंकारसिंह आदि हैं।
  • प्रमुख वाद्य – चंग

मेवाड के शाह अली और तुकनगरी नामक संत पीरों ने 400 वर्ष पूर्व तुर्रा कलंगी की रचना की। ‘तुर्रा’ को ‘शिव’ और ‘कलंगी’ को ‘पार्वती’ का प्रतीक माना जाता है। तुकनगीर ‘तुर्रा’ के तथा शाह अली ‘कलंगी’ के पक्षकार थे। इनके शिव-शक्ति संबंधी विचारों को लोगों तक पहुंचाने का मुख्य माध्यम काव्यमय रचनाएं थीं, जिन्हें ‘दंगल‘ के नाम से जानते हैं। तुकनगीर भगवा व शाह अली हरे वस्त्र धारण कर प्रस्तुति देते। दोनों ने मेवाड़ आकर यह विघा प्रचलित की। चन्देरी के राजा ने तुकनगीर को अपने मुकुट का तुर्रा एवं शाहअली को कंलगी भेंट की तब से इसे तुर्रा कलंगी ख्याल के नाम से जाना जाने लगा।

इसमें 20 फुट ऊँचे दो रंगमंच आमने-सामने बनाकर उसकी राजस्थानी शैली में भरपूर सजावट की जाती है। दो खिलाडी अपने अपने मंचो पर आते है और प्रस्तुति देते है। तुर्रा कलंगी के संवादों को ‘बोल‘ कहते हैं और ये काव्यत्मक होते हैं। तुर्रा कलंगी के सर्वप्रथम खेले गए ख्याल का नाम ‘तुर्रा कलंगी का ख्याल’ था। इसकी प्रकृति गैर व्यावसायिक है। इस लोकनाट्य में दर्शक के भाग लेने की सर्वाधिक संभावनाएं होती हैं। इसमें चंग बजाया जाता है।

तुर्रा कलंगी ख्याल की विशेषताएं :

  • यह गैर व्यावसायिक लोक नाट्य है।
  • तुर्रा-कलंगी की शैली को माच का ख्याल कहते है।
  • इसमें स्त्री पात्रों की भूमिका पुरूषों द्वारा निभाई जाती है।
  • इसमें मंच सज्जा की परंपरा है जो अन्य ख्याल से भिन्न है।
  • इस लोकनाट्य में दर्शक भी भाग लेते है।

किशनगढी ख्याल

मुख्य केन्द्र – अजमेर
प्रमुख कलाकार – बंशीधर

ढप्पाली ख्याल

मुख्य केन्द्र – अलवर
प्रमुख वाद्य यंत्र – ढोल, नगाड़ा, शहनाई
श्री मोतीलाल (बीकानेर), प्रसिद्ध ख्याल लेखक, इन्होंने गोपीचन्द व अमरसिंह राठौड़ पर ख्याल लिखे।
अलवर भरतपुर, लक्ष्मणगढ़ का क्षेत्र ढप्पाली ख्याल के लिए प्रसिद्ध है।

तमाशा

तमाशा मूल रूप से महाराष्ट्र का लोकनाट्य है जो सवाई प्रताप सिंह के काल में जयपुर में लोकप्रिय हुआ। जयपुर महाराजा सवाई प्रतापसिंह, तमाशा के प्रमुख कलाकार बंशीधर भट्ट को महाराष्ट्र से लेकर आये व अपने गुणीजन खाने में शामिल कर तमाशा लोकनाट्य का प्रारम्भ किया। भट्ट परिवार परम्परागत रूप से आज भी तमाशा का लोक मंचन करता है। फूलजी भट्ट, गोपीकृष्ण भट्ट व वासुदेव भट्ट इस परम्परा को जीवित रखे हुए हैं। जिस खुले मैदान में तमाशा का आयोजन होता है उसे अखाड़ा कहा जाता है। जयपुर की प्रसिद्ध नृत्यांगना गौहर जान तमाशा में भाग लेती थी।

तमाशा से जुड़े मुख्य बिंदु

  • तमाशा संगीत प्रधान लोक नाट्य है। इसमें संगीत, नृत्य और गायन तीनों की प्रधानता होती है।
  • इसमें स्त्री पात्रो की भूमिका स्त्रियों द्वारा निभाई जाती है।
  • रामसिंह द्वितीय ने तमाशा के कलाकारों को आश्रय प्रदान किया था।
  • मुख्य कहानियां – जुठठ्न मियां का तमाशा, जोगीजोगण का तमाशा, गोपीचन्द, हीर रांझा
  • मुख्य पुरुष कलाकार – गोपीजी भट्ट, मन्नूजी भट्ट, फलजी भट्ट वासुदेव भट्ट
  • मुख्य स्त्री कलाकार – गौहर जान
  • प्रमुख वाद्य – सारंगी, तबला, नक्कारा, हारमोनियम।
  • वंशीधर भट्ट (दानी शिरोमणी) द्वारा रचित तमाशे – पठान, जोगी-जोगन, कान-गूजरी, लैला-मजनू, रसीली-तम्बोलन, छैला-पनिहारिन, हीर-राँझा, छुट्टन-मियाँ
  • जयपुर क्षेत्र में निम्न अवसरों पर अलग अलग तमाशे किये जाते थे
    • शीतलाअष्टमी – जुठठंमियाँ
    • होली – जोगी-जोगन
    • होली के दुसरे दिन – हीर – रांझा
    • चैत्र अमावस्या – गोपीचंद

गवरी

वादन, संवाद, प्रस्तुतिकरण और लोक-संस्कृति के प्रतीकों में मेवाड़ के भीलों की ‘गवरी’ अनूठी है। इसमें पौराणिक कथाओं, लोक-गाथाओं और लोक-जीवन की विभिन्न झाँकियों पर आधारित नृत्य नाटिकाएं होती हैं। रक्षाबंधन के दूसरे दिन भादवा कृष्णा एकम को खेडा देवी से भोपा गवरी मंचन की आज्ञा लेता है। इसके बाद पात्रों के वस्त्र बनते हैं । पात्र मंदिरों में ‘धोक’ देकर नव-लाख देवी-देवता, चौसठ योगिनी और बावन भैंरू को स्मरण करते हैं।

भील समाज की मान्यता है कि भगवान शिव उनके दामाद है और गौरजा अर्थात् पार्वती बहन-बेटी है। ठंडी राखी(रक्षाबंधन के दूसरे दिन) के दिन कैलाश पर्वत से गौरजा अपने पीहर मृत्यु लोक में सभी से मिलने आती है। गवरी खेलने के बहाने सवा माह तक अलगअलग गांव में यह सबसे मिलती है। जनजाति के लोग गौरजा देवी को सर्वकल्याण तथा मंगल की प्रदात्री मानते हैं। गवरी लोक नृत्य नाटिका खेलने वालों को खेल्ये कहा जाता है।

गवरी लोक नाट्य मंचन के दौरान पूरे सवा महीने तक यह खेल्ये मात्र एक समय भोजन करते है व नहाते नहीं है। मांस मदिरा को नहीं छूते व ब्रह्मचर्य का पालन करते हैं। पांव में जूते नहीं पहनते हैं। एक बार घर से बाहर निकलने के बाद सवा माह तक अपने घर भी नहीं जाते हैं।
एक गांव का गवरी दल केवल अपने गांव में ही नहीं नाचता है, अपितु हर दिन उस अन्य गांव में जाता है, जहां उनके गांव की बहन-बेटी ब्याही गई है। नृत्य के अंत में गवरी को न्यौतने वाली बहन-बेटी उन्हें भोजन कराती है और कपड़े भेंट करती है, जिसे पहरावणी कहते हैं। कई बार जिस बहन-बेटी के गांव में गवरी खेली जाती है उस गांव में सभी मिलकर भोजन एवं पहरावणी का बंदोबस्त करते हैं।

इस खेल में दो मुख्य पात्र राईबड़िया और राईमाता सबसे अहम होते हैं। राईबड़िया को शिव तथा राईमाता को पार्वती माना जाता है। इसलिए दर्शक इन पात्रों की पूजा भी करते हैं। गवरी का मूल कथानक शिव और भास्मासुर से सम्बन्धित है। इसका नायक राईबुड़िया होता है, जो शिव तथा भस्मासुर का प्रतीक है। राईबुडिया की वेशभूषा विशिष्ट होती है। गवरी के मुख्य खेलों में कान्ह-गुजरी, कालू कीर, बणजारा, मीणा, नाहर-सिंही, नाहर, कालका देवी, कालबेलिया, रोई-माछला, सूर-सूरडी, भंवरा-दानव, बड़ल्या-हिंदवा, कंजर-कंजरी, नौरतां, हरिया-अंबाव, खेतूड़ी एवं बादशाह की सवारी जैसे कई खेल आकर्षण का केन्द्र होते हैं।

रक्षाबंधन के दूसरे दिन से ठीक चालीसवें दिन गडावणवलावण पर्व के साथ गवरी का समापन किया जाता है। इस दिन गौरजा देवी की गजारूढ़ प्रतिमा को जल में विसर्जित किया जाता है। खेल्ये मिट्टी से गौरजा देवी की हाथी पर आरुढ़ प्रतिमा बनाते हैं। जिस दिन गौरजा देवी की प्रतिमा बनाई जाती है, उसी दिन गडावण पर्व मनाया जाता है। जिस दिन इसे विसर्जित किया जाता है उस दिन को वलावण पर्व कहा जाता है।

राजस्थान के लोकनाट्य : रम्मत

  • मुख्य केंद्र – जैसलमेर, फलौदी तथा बीकानेर
  • मुख्य कलाकार
    • बीकानेर – मनीराम व्यास, तुलसीराम, फागू महाराज, सूआ महाराज
    • जैसलमेर – परमानंद, गिरधारी सेवक, तेजकवि, सकतमल, तुलसीदास, जीतमल

होली के अवसर पर जैसलमेर, बीकानेर में होने वाली लोक काव्य प्रतियोगिताओं से ‘रम्मत’ का उद्भव हुआ है। बीकानेर व जैसलमेर क्षेत्र के ख्याल को ही रम्मत कहते है। इसमें राजस्थान के सुविख्यात लोक नायकों एवं महापुरुषों पर रचित काव्य रचनाओं को रंगमंच के ऊपर मंचित किया जाता है। इस व्यावसायिकता के युग में रम्मत आज भी सामुदायिक लोकनाट्य का रूप लिए हुए है। मनीराम व्यास, तुलसीराम, फागू महाराज, सूआ महाराज, तेज कवि (जैसलमेरी) आदि रम्मतों के प्रमुख रचयिता है। रम्मतों का प्रारम्भ फकड़ बाबा की रम्मत व रामदेवजी के भजन से किया जाता है। इसमें चौमासा, लावणी, गणपति वंदना गयी जाती है।

तेज कवि जैसलमेरी ने रम्मत का अखाड़ा श्रीकृष्ण कम्पनी के नाम से चालू किया । सन् 1943 में उन्होंने ‘स्वतंत्र बावनी‘ की रचना की और उसे महात्मा गाँधी को भेंट कर दी।

रम्मत शुरू होने से पहले कलाकार रंगमंच पर बैठकर अपनी वेशभूषा व मेकअप दर्शकों को दिखाते है। ‘रम्मत’ की मंच योजना खुले मोहल्ला या मंडी ( बाजार के चौक) में होती है। बड़े-बड़े लकड़ी के पाटों पर राजा-रानी के बैठने के लिए छतरीनुमा सिंहासन बनाया जाता है। मुख्य मंच के चारों ओर दर्शक बैठते हैं। ऊँचे मंच पर वादक नगाड़ा, तबला, झांझ, चिमटा, तंदुरा, ढोलक, हारमोनियम आदि लेकर एक कोने बैठते हैं। रम्मत की मूल ऊर्जा ‘टेरिये’ होते हैं । टेरिये के बोल के साथ पात्र नाचते हुए अपनी कला प्रदर्शित करते हैं।

रम्मत लोकनाट्य से जुड़े मुख्य बिंदु :

  • खिलाड़ी – मुख्यतः पुष्करणा ब्राह्मण
  • खेलार – रम्मत लोक नाट्य को अभिनीत करने वाले कलाकारहोते है। तथा रमतिये / रामतिये खेल प्रदर्शित करने वाले को कहते है।
  • इसमें स्त्री पात्रों की भूमिका पुरूषों द्वारा की जाती है।
  • बीकानेर में मंचन पाटो पर पाटा संस्कृति बीकानेर की देन है।
  • ‘रम्मत’ की मंच योजना खुले मोहल्ला या मंडी ( बाजार के चौक) में होती है।
  • हेड़ाऊ मेरी की रम्मत जो की आदर्श पति-पत्नी पर आधारित सर्वाधिक लोकप्रिय रम्मत रही का सूत्रपात स्व. जवाहरलाल जी पुरोहित ने किया था।
  • रम्मत ख्यात – पूरन भक्त की, मोरध्वज की, डूंगजी-जवाहरजी की, राजा हरिश्चंद्र और गोपीचन्द भरथरी
  • बीकानेर की प्रसिद्ध रम्मत
    • आचार्यों की चौक की अमरसिंह राठौड़ की रम्मत
    • बिस्सों की चौक की चौबेल नौटंकी की रम्मत
    • कीकाणी व्यासों के चौक की जमनादास जी की रम्मत

राजस्थान के लोकनाट्य : नौटंकी

प्रवर्तक – श्री भूरीलाल (डीग, भरतपुर)
प्रमुख खिलाड़ी – गिरिराज प्रसाद ( कामां, भरतपुर ), कृष्णा कुमारी
मुख्य कहानियां – अमर सिंह राठौड़, आल्हा उदल, सत्यवान सावित्री।

नौटंकी भरतपुर जिले का प्रमुख लोकनाट्य है। उत्तरप्रदेश की हाथरस शैली से प्रभावित लोकनाट्य है जिसमें सारंगी, ढपली, शहनाई आदि वाद्य यंत्रों का प्रयोग किया जाता है। इसमें महिला तथा पुरुष दोनों भाग लेते हैं।
नौटंकी गाँवों में अधिक प्रचलित है। नत्थाराम की मण्डली ने इसे धौलपुर और भरतपुर क्षेत्र में प्रस्तुत किया। नौटंकी विवाह समारोह, उत्सवों एवं मेलों के अवसर पर प्रस्तुत की जाती है।

राजस्थान के लोकनाट्य : चारबैंत

चारबैंत मूल रूप से अफगानिस्तान का लोकनाट्य है। पहले यह पश्तो भाषा में प्रस्तुत किया जाता था। यह राजस्थान में टोंक क्षेत्र में लोकप्रिय है। टोंक के नवाब फैजुल्ला खां के समय अब्दुल करीम खां निहंग व खलीफा करीम खां निहंग ने स्थानीय भाषा में इसकी शुरूआत की। चारबैंत वीर रस प्रधान लोकनाट्य है। युद्ध के दौरान सिपाहियों का उत्साह बढाने हेतु इसे प्रस्तुत किया जाता था।
प्रमुख श्रेणियां – भक्ति, श्रृंगार, रकीब खानी और गम्माज
मुख्य वाद्य यंत्र – डफ

चारबैंत के कलाकार व उनके उपनाम

कलाकारउपनाम
रियाजुद्दीन खांकव्वालों के बादशाह
साकर खां कमायचा के जादूगर
हकिम खाडाक टिकट वाले दादा
सिद्धीक खांखड़ताल के जादूगर
राम किशन सोंलकी नंगाडे का जादूगर
गणपत लाल डांगी गीगला का बापू
कैलाश जागोटियाक्लॉथ आर्ट’ के जन्मदाता
गुलाम गौस खां गुलाम गौस खां
श्रेष्ठा सोनी लिटिल वंडर

भवाई

यह उदयपुर संभाग की भवाई जाति का लोकनाट्य है। यह व्यावसायिक श्रेणी का लोकनाट्य माना जाता है। इसमें कलाकार मंच पर आकर अपना परिचय नहीं देते हैं। इसमें संगीत की बजाय नृत्य अभिनय व कलाकारी पर अधिक जोर दिया जाता है। इसके विषय मुख्यतः सामाजिक समस्यायों पर केन्द्रित होते है। शान्ता गांधी के नाटक जसमल ओडवा पर भवाई लोकनाट्य किया जाता है जो अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर प्रसिद्ध है।
मुख्य कलाकार – बाघजी
वाद्य – सांरगी, नफरी, नगाडा मंजीरा ।

प्रमुख भवाई लोक नाट्य

  • जसमल ओडवा
  • बीकाजी और बाघजी
  • ढोला मारू
  • सगोजी-सगीजी

राजस्थान के लोकनाट्य: स्वांग

लोक-नाट्यों में ‘स्वांग की भी एक परम्परा है। किसी विशेष ऐतिहासिक, पौराणिक, लोक प्रसिद्ध या समाज में प्रसिद्ध चरित्र तथा देवी – देवताओं के रूप को अपने में आरोपित कर उसे प्रस्तुत करना ही स्वांग कहलाता है। स्वांग गाँवों में अधिक प्रचलित है। इसका कलाकार बहरूपिया कहलाता है । इस विलुप्तप्रायः कला का सबसे नामी कलाकार केलवा का परशुराम है।
इसके प्रसिद्ध कलाकार जानकी लाल भांड (भीलवाड़ा) ने भारत उत्सवों में राजस्थान का प्रतिनिधित्व किया है।उनके प्रयासों द्वारा बहरूपियां कला राष्ट्रीय व अन्तराष्ट्रीय स्तर पर विख्यात हुई । लन्दन में जानकीलाल भाण्ड ने बन्दर का रूप धारण करके मंकी मैन के रूप में ख्याति अर्जित की। वर्तमान में उनके पुत्र लादूलाल भाण्ड इसके कलाकार है।

टूटिया, टूटकी अथवा खोड्या – दूल्हे की बारात लड़की वाले के यहाँ जाने के पश्चात् वर पक्ष की महिलाओं द्वारा वर-वधू की नकल के रूप में स्वांग प्रदर्शित किया जाता है उसे टूटिया, टूटकी अथवा खोड्या निकालना कहते हैं। इसमें एक महिला वर तथा दूसरी वधू बनती है तथा उनका नकली विवाह कराया जाता है। इसका उद्देश्य असली वर-वधू को आधि-व्याधि से मुक्त रखने की मनोकामना है।

स्वांग लोकनाट्यों से जुड़े कुछ बिंदु :

  • स्वांग कला भरतपुर क्षेत्र की पुरानी मनोरंजक विद्या।
  • रावल, भांड, मानमति जाति द्वारा स्वांग प्रस्तुत किया जाता है।
  • चैत्र कृष्णा त्रयोदशी को भीलवाड़ा जिले के मांडल में नाहरों का स्वांग बहुत प्रसिद्ध है।
  • मारवाड जाति में रावल जाति के लोगों द्वारा स्वांग।
  • धनरूप भांड इस विद्या के प्रसिद्ध खिलाड़ी है उन्हें महाराजा मानसिंह ने जागीर प्रदान की थी।
  • देवगढ़ (राजसमंद) के भांड प्रसिद्ध है।
  • गीदड के स्वांग शेखावटी के प्रसिद्ध ।
  • राजस्थान में प्रचलित स्वांग नाट्य
    • बहुरूपियां स्वांग – इसके पात्र लोक चरित्र के अनुसार अपना रूप बनाते है।
    • नाहर – भीलवाड़ा में चैत्र कृष्णा त्रयोदशी को (1614ई. शाहजहां के समय प्रचलित)।
    • सवारी व जुलुस नाट्य में कोटा का न्हाण।
    • चौकच्यानणी – शेखावटी में गणेश चतुर्थी की रात्रि में बच्चों द्वारा किया जाने वाला स्वांग।

लीला नाट्य

लीला नाट्य राजस्थानी लोक नाट्य का बहुप्रचलित रूप है। इनमे रामलीला व रासलीला प्रमुख है। इनके अतिरिक्त लीलाओं के कुछ और रूप भी प्रचलित हैं, जैसे- रावलों की रामत, समया, गवरी, सनकादिकों की लीलाएं, गरासियों की गोर लीलाएं और कृष्ण लीला।

रामलीला

रामलीला का मुख्य प्रयोजन भगवान राम के जीवन प्रसंगों का जीवन्त चित्रण है। इसे तुलसीदासजी द्वारा शुरू किया गया था। इसके प्रस्तुतीकरण में भरतपुर, पाटूदा तथा बिसाऊ की अपनी अलग पहचान है। इसमें नृत्य, गीत एवं विभिन्न वाद्यों का प्रयोग किया जाता है।

  • बिसाऊ (झुन्झुनू) में मूक रामलीला होती है।
  • अटरू (बारां) की रामलीला में धनुष को भगवान राम नहीं तोड़ते बल्कि जनता द्वारा तोड़ा जाता है।
  • भरतपुर में वेंकटेश रामलीला होती है।
  • 2 1/2 कड़ी के दोहो की रामलीला मांगरोल (बारां) की प्रसिद्ध ।

रासलीला

रासलीला वल्लभाचार्यजी द्वारा प्रारम्भ किया गया था। रासलीलाओं में श्रीकृष्ण के बाल्यकाल और किशोरावस्था की लीलाओं का प्रस्तुतीकरण किया जाता है । फुलेरा, जयपुर, असलपुर, हरदोणा, गुण्डा आदि में रासलीला की अनेक मण्डलियां हैं।

गोर

गोर का आयोजन गरासियों द्वारा वैशाख शुक्ल चतुर्दशी को भख्योर की गणगोर के नाम से किया जाता है। इसमें लकड़ी की गोर एवं हँसर को गरासिया स्त्रियां अपने सिर पर रखकर नृत्य करती हैं। इनके बीच में पुरुष मुखौटा लगाकर तलवारबाजी का प्रदर्शन करता है।

सनकादिकों की लीलाएं

इन लीलाओं के प्रमुख अखाड़े घोसुंडा तथा बस्सी हैं।

  • घोसुंडा में राधा-कृष्ण के युगल स्वरूप एवं रासादि लीलाओं का आयोजन किया जाता है। अवतारों के चेहरे विभिन्न प्रकार के मुखौटे धारण किए रहते हैं
  • बस्सी में ब्रह्मा, गणेश, कालिका, हिरण्यकश्यप, नृसिंहावतार आदि की झांकियां भी प्रदर्शित की जाती हैं।

गंधर्व नाट्य

यह मूलतः मारवाड़ क्षेत्र का लोक नाट्य है। यह जैन धर्म पर आधारित लोकनाट्य है ।गंधर्व पेशेवर नृत्यकार होते है इनके द्वारा संगीत नाट्य अजना सुन्दरी और मैना सुन्दरी का प्रदर्शन किया जाता है। गंधर्व नाट्य कलाकार सभ्य शिक्षित और शिष्ट होते है तथा अपने जीवन के मिशन के रूप में इन्हें करते है।

दंगली नाट्य

नाट्य में भी दो दल होते है जिनमे लोगों की संख्या सैकड़ो में होती है। वे आमने सामने खड़े हो जाते है। इस प्रकार के लोक नाट्य को संगीत दंगल कहते है।

  • कन्हैया, भेट, हेला और ढप्पाली ख्याल के दंगल आत्यधिक लोकप्रिय।
  • धोलपुर का बाड़ी बसेड़ी क्षेत्र भेंट दंगल हेतु प्रसिद्ध ।
  • करौली क्षेत्र कन्हैया दंगल हेतु प्रसिद्ध है।
  • रसिया दंगल भरतपुर डीग क्षेत्र में प्रसिद्ध है।

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