राजस्थानी साहित्य

राजस्थानी साहित्य

राजस्थानी साहित्य से तात्पर्य राजस्थान भू-भाग में बोली जाने वाली जनभाषा में लिखित और मौखिक साहित्य से है। यह साहित्य विपुल और विशाल है। राजस्थानी भाषा के साहित्य को हिन्दी साहित्य के प्रारम्भिक काल का साहित्य माना जाता है। इसका प्रारंभिक साहित्य हमें अभिलेखीय सामग्री के रूप में मिलता है।

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अभिलेखीय साहित्य – शिलालेखों, अभिलेखों, सिक्कों तथा मुहरों में जो साहित्य उत्कीर्ण है उस साहित्य को अभिलेखीय साहित्य कहा जाता है। यद्यपि यह सामग्री अत्यल्प मात्रा में उपलब्ध होती है लेकिन जितनी भी सामग्री उपलबध होती है उसका साहित्यिक एवं ऐतिहासिक महत्त्व है।

राजस्थानी साहित्य की इतिहास परंपरा को हम निम्न रूप में प्रस्तुत कर सकते हैं –

काल-परकप्रवृत्ति-परककाल-क्रम
1.प्राचीन कालवीरगाथा काल1050 से 1550 ई.
2.पूर्व मध्य कालभक्ति काल1450 से 1650 ई
3.उत्तर मध्य कालश्रंगार, रीति एवं नीति परक काल1650 से 1850 ई.
4.आधुनिक कालविविध विषयों एवं विधाओं से युक्त1850 ई. से अद्यतन

इसके अतिरिक्त राजस्थानी साहित्य को विषय और शैली की दृष्टि से पांच भागों में बांटा जा सकता है :-

  • चारणी साहित्य
  • संत साहित्य
  • ब्राह्मणी साहित्य
  • जैन साहित्य
  • लोक साहित्य

प्राचीन काल – वीरगाथा काल (1050 से 1550 ई.)

भारतवर्ष पर पश्चिम दिशा से हो रहे निरंतर हमलों का अत्यधिक प्रभाव राजस्थान प्रदेश पर पड़ रहा था यहां के शासकों को संघर्ष करना पड़ रहा था। और ऐसी परिस्थिति में संघर्ष की भावना को बनाए रखने के लिए तथा समाज में वीर नायकों के आदर्श को प्रस्तुत करने के लिए वीर रसात्मक काव्यों का सृजन किया गया। इस काल में वीरता प्रधान काव्यों की प्रमुखता के कारण ही इस काल को वीरगाथा काल का नाम दिया गया है।

1169 तक, राजस्थानी भाषा अनिवार्य रूप से मौखिक थी और इसलिए 1169 ईस्वी से पहले कोई महत्वपूर्ण साहित्य कार्य मौजूद नहीं हैं। राजस्थान में साहित्य रचना के प्रमाण 13वीं शताब्दी से मिलते है राजस्थान साहित्य का प्रारम्भिक काल 11वीं शताब्दी से प्रारंभ होकर 1460 ई. तक माना जाता है।

  • इस प्रारंभिक काल में जैन विद्वानों, आचार्यों और भिक्षुओं का प्रभुत्व था इस काल के महत्वपूर्ण रचना कार्य :
    • भरतेश्वर बाहुबली घोर – ब्रजसेन सूरी
    • भरतेश्वर बाहुबली रास – शालिभद्र सूरी
    • जियारद्या रास – आसिग द्वारा
    • पद्मावती चौपाई – जिनप्रभा सूरी द्वारा
    • स्थूलीभद्र फाग – हलराज द्वारा
    • ज्ञान मंजरी – विजना द्वारा
  • गैर जैन सम्बंधित कार्य
    • पृथ्वीराज रासो – 12 वीं शताब्दी – चंदबरदाई द्वारा
    • अचलदास खिंची री वचनिका – शिवदास गाढ़ण
    • वीसलदेव रास – नरपति नाल्ह
    • रणमल्ल छंद – श्रीधर व्यास
  • प्रारंभिक काल से संबंधित साहित्य राजस्थानी और गुजराती की सम्मिलित विरासत हैं।

पूर्व मध्य काल – भक्ति काल (1450 से 1650 ई.)

राजस्थान के युद्ध संघर्ष के लम्बे इतिहास ने धर्म और संस्कृति को व्यापक रूप से प्रभावित किया है । संघर्षों में साम्राज्य विस्तार के साथ-साथ धर्म के प्रचार-प्रसार की प्रवृत्ति की भी झलक दिखती है। ऐसी परिस्थितियों में संघर्षमुक्त होने तथा समस्त प्रकार के विभेदों को मिटाने के लिए लोग भक्ति की ओर प्रवृत्त होने लगे तथा ऐसे समय में कई संतों और भक्तों ने अपनी साहित्य रचनाओं से जन-सामान्य को सही राह दिखाई इस कारण इस काल को भक्ति काल का नाम दिया गया।।

इसी काल में लोग संतों और उनके द्वारा प्रवृत्त संप्रदायों का अनुसरण करने लगे। इन संप्रदायों में रामस्नेही, दादूपंथ, नाथपंथ, अलखिया संप्रदाय, विश्नोई संप्रदाय, जसनाथी संप्रदाय आदि प्रमुख हैं।

  • ये सम्प्रदाय अपनी भक्ति के मार्ग के आधार पर मुख्य रूप से 2 भागों में बंटे हुए “सगुण” तथा “निर्गुण”
  • इस प्रकार की रचनाओं में किया गया कार्य :
    • भक्त शिरोमणि मीराबाई के पद
    • वेलि किसण रूकमणि री – पृथ्वीराज राठौड़
    • रामरासो – माधोदास दधवाडिया
    • हरिरस – ईसरदास
    • देवियांण – ईसरदास
    • नागदमण – सायांजी झूला की
    • ढोल मारू रा दूहा(1473) – कवी कल्लोल
    • कान्हड़दे प्रबन्ध – कवि पद्मनाभ (1455 में पश्चिमी अपभ्रंश में रचित ग्रन्थ है। इसमें रावल कान्हड़े की गाथा है साथ-साथ तात्कालिक सामाजिक व सांस्कृतिक चित्रण भी इस कृति में प्रस्तुत हुआ है।)
    • हम्मीरायण

उत्तर मध्य काल श्रृंगार, रीति एवं नीति परक काल (1650 से 1850 ई.)

राजस्थानी साहित्य के उत्तर मध्य काल का साहित्य विविध विषयों से युक्त रहा। इस काल में राजनीतिक दृष्टि से अपेक्षाकृत शांति का काल रहा। शासकों ने अपने राज्य में कलाकारों और साहित्यकारों को संरक्षण प्रदान किया, जिन्होंने साहित्य और कला के विविध आयामों का विकास किया। इस काल में श्रृंगार, रीति तथा नीति से संबंधित रचनाएं प्रस्तुत की गईं। इसे राजस्थानी साहित्य का स्वर्ण युग माना जाता है।
इस काल की प्रमुख रचनाएँ :

  • काव्य शास्त्र से संबंधित
    • रघुनाथ रूपक – कवि मंछाराम
  • संबोधन परक नीति कारकों में
    • राजिया रा सौरठा – कृपाराम बारहठ
    • चकरिया रा सौरठा – धनसिंह राजपुराहित
    • मोतिया रा सौरठा – भगवती लाल शर्मा
    • भेरिया रा सौरठा
  • बुद्धी रासो (1568) – जल्ल
  • खुमान रासो – दलपत विजय
  • बिन्हाई रासो – महेशदास
  • हाला झाला ऋ कुण्डलिया – ईसरदास

आधुनिक काल, विविध विषयों एवं विधाओं से युक्त(1850 से अद्यतन)

  • भारतीय स्वतंत्रता के पहले स्वतंत्रता संग्राम (सन् 1857) के पश्चात् समाज में जिस नवीन चेतना का संचार हुआ उसका साहित्य पर भी व्यापक प्रभाव पड़ा जिसे साहित्य में आधुनिक काल का नाम दिया गया।
  • राजस्थानी साहित्य में मारवाड़ के कविराजा बांकीदास और बूंदी के सूर्यमल्ल मीसण ने अपने क्रांतिकारी विचारों से समाज में नई चेतना का प्रसार किया। इसका प्रभाव आने वाली पीढ़ी के साहित्यकारों पर भी व्यापक रूप से पड़ा।
  • 19वीं शताब्दी के मध्य में, बूंदी के सूर्यमल मिश्रण ( राजस्थान के भूषण) ने वीररस कविता को पुनर्जीवित करने का प्रयास किया और वंश भास्कर तथा वीर सत्सई की रचना की।
  • उसी काल के एक अन्य महान कवि अलवर के रामनाथ कविया थे जिन्होंने द्रौपदी विनय तथा पबुजी रा सौरठा की रचना की थी।
  • गीता, पतंजलि के योगसूत्र का मेवाड़ी भाषा में अनुवाद – महाराजा चतुर सिंह
  • सैनाणी कविता – मेघराज मुकुल

आधुनिक राजस्थानी साहित्य

  • कवि उमरदान ने विक्रम संवत 1956 के “छप्पनिया काल” के दौरान लोगों के कष्टों और दुखों के बारे में विस्तार से लिखा।
  • कवि रामनाथ ने “द्रौपदी विनय” नामक अपने कविता संग्रह में महिला सशक्तिकरण के विषय पर प्रकाश डाला।
  • स्वतंत्रता संग्राम में अपने प्रत्यक्ष प्रयासों के साथ-साथ अपने प्रेरक शब्दों के माध्यम से योगदान देने वाले प्रसिद्ध कवि-केसरी सिंह बारहठ, विजय सिंह पथिक, माणिक्यलाल वर्मा, जय नारायण व्यास, गणेशलाल व्यास।
  • आधुनिक काल में राजस्थानी भाषा का वृहद् शब्द कोश लिखने का महत्वपूर्ण कार्य जोधपुर के सीताराम लालस ने किया
  • एक राजस्थानी शब्दकोश ब्रदीप्रसाद साकरिया ने तैयार किया।
  • सैनाणी – मेघराज मुकुल
  • धरती धोरा री, मींझर, लीलटों – कन्हैयालाल सेठिया
  • मांझल रात, अमोलक वतन, मूमल, गिर ऊंचा ऊंचा घर, के इरा चकवा बात लक्ष्मी कुमारा चुंडावत द्वारा रचित है।
  • विजयदान देथा की कृतियाँ – बातां री फुलवारी (राजस्थान की लोक कथाओं का संग्रह), दुविधा (आधारित फिल्म -पहेली), उलझन, अलेखु, हिटलर, सपन प्रिया
  • कहानी – नाथमल जोशी द्वारा रचित परण्योड़ी-कुंवारी
  • उपन्यास – नाथमल जोशी द्वारा रचित आभै पटकी, धोरां रो धोरी, एक बीनणी दो बीन
  • उपन्यास – यदवेंद्र शर्मा द्वारा रचित जमारो और समंद और थार


राजस्थानी साहित्य के प्रकार

चारणी साहित्य

चारणी साहित्य अधिकांश पद्य में है और वीर रसात्मक है। इसमें चारण, भाट, ढाढ़ी, ब्रह्मभट्ट आदि विरुद गायक जातियों की कृतियाँ है। यह साहित्य प्रबन्ध काव्य के रूप में, गीतों के रूप में, दोहों, सोरठों, कुण्डलियों, छप्पयों, कवित्तों, झूलणों आदि के रूप में उपलब्ध है। इस साहित्य की प्रमुख रचनाएँ इस प्रकार है :

  • प्रबन्ध काव्य के रूप में:
    • वेलि किसण रूकमणि री – पृथ्वीराज राठौड़
    • रामरासो – माधोदास दधवाडिया
    • पृथ्वीराज रासो – चंद्रबरदाई
  • गीत कृतियाँ:
    • बारहठ चौहथ
    • आसियो रतनसी
    • बगसो गोवरधन
    • हरदास
    • लाखो
  • दोहा संग्रह:
    • ढोला मारू रा दूहा – कवि कल्लोल
    • गंगाजी रा दूहा – पृथ्वीराज राठौड़
    • ठाकुरजी रा दूहा – पृथ्वीराज राठौड़
    • जवानी रा दूहा
  • छन्दों की प्रसिद्ध रचनाएँ :
    • राजिये रा सोरठा
    • हॉलाझाला रा कुण्डलियाँ
    • गजसिंह रा झलणा
    • मयण रा कवित्त
    • करमसेण री झमाल
    • अमरसिंह रा सवैया

गद्य साहित्य ख्यात, वात, पीढी, पट्टावली, पीढ़ियावली, वंशावली, हकीकत, शान्त, इतिहास, कथा, कहानी. दवावैत आदि कई रूपों में मिलता है। बांकीदास और दयालदास की ख्यात, वंश भास्कर आदि राजस्थानी गद्य साहित्य की प्रसिद्ध कृतियाँ हैं।

जैन साहित्य

जैन धर्मावलम्बियों, अनुयायियों तथा जैन धर्म से प्रभावित साहित्यकारों द्वारा रचित साहित्य जैन साहित्य कहलाता है। इसमें कथात्मक अंश वाली धार्मिक रचनाएँ होती है जो गद्य और पद्य दोनों रूपों में मिलता है। पद्य के क्षेत्र में नीति,शांत, श्रृंगार आदि के भावपूर्ण दोहे प्राप्त होते हैं।
जैन साहित्य की प्रमुख रचनाएँ:

  • धूर्ताख्यान – हरिभद्र सूरि
  • समुद्रकाव्य – हरिभद्र सूरि
  • कुवलयमाला – उद्योतन सूरि
  • सुखनिदान – जगन्नाथ
  • पंचग्रन्थी व्याकरण – बुद्धिसागर सूरि
  • भरतेश्वर बाहुबलि घोर – ब्रजसेन सूरि
  • नेमिनाथ बारहमासा – पल्हण
  • उपमिति भव प्रपन्चा – सिझर्षि

संत साहित्य

संत साहित्य मुख्यत: पद्य में है। प्रमुख संत साहित्य की रचनाएँ :

  • मीरा की पदावली
  • दादू की वाणी
  • नरसिंहजी रो मायरो
  • रामचरण जी की वाणी
  • जसनाथ जी की वाणी
  • सुन्दरदास जी की वाणी
  • गोरखनाथ जी की वाणी
  • जाम्भोजी जी की वाणी

लोक साहित्य

लोक साहित्य से तात्पर्य किसी देश अथवा क्षेत्र की आदिकाल से लेकर अब तक की उन सभी प्रवृत्तियों के प्रतीक से है जो साधारण जनस्वभाव के अंतर्गत आती हैं। लोक साहित्य की विविध विधाओं में अनेक विषय तथा घटनाओं से सम्बन्धित लोकगीत, जनकाव्य, लोकगाथाएँ, प्रेमकथाएँ, लोकनाट्य पहेलियाँ तथा कहावतें सम्मिलित हैं।
राजस्थान का प्रसिद्ध लोक साहित्य:

  • फड़ – राजस्थान में देवी-देवताओं की गाथाओं का कपड़े पर बने चित्रों के माध्यम से पट-चित्रण किया जाता है जिसे राजस्थानी भाषा में ‘फड़’ कहा जाता है।फड़ चित्रांकन का प्रधान केन्द्र शाहपुरा (भीलवाड़ा) है।
  • लोक काव्य – ढोला मारू रा दूहा(कवि कल्लोल)

राजस्थानी साहित्य के रूप

ख्यात

संस्कृत भाषा के शब्द ख्यात का शाब्दिक अर्थ ख्यातियुक्त, प्रख्यात, विख्यात, कीर्ति आदि है। अर्थात ख्याति प्राप्त प्रसिद्ध एवं लोक विश्रुत पुरुषों, राजाओं आदि के सम्मान, सफलताओं और जीवन घटनाओं का संग्रह ख्यात कहलाता है। ख्यातों से तत्कालीन समाज की राजनैतिक, आर्थिक, धार्मिक, नैतिक एवं सांस्कृतिक प्रवर्तियों का दिग्दर्शन होता है। ख्यातों का नामकरण वंश. राज्य या लेखक के नाम से किया जाता था, जैसे राठौड़ां री ख्यात, मारवाड़ राज्य री ख्यात, नैणसी की ख्यात आदि।
ख्यातों का लेखन मुग़ल बादशाह अकबर (1556-1605 ई.)के शासनकाल से प्रारम्भ माना जाता है। इतिहास के विषयानुसार और शैली की दृष्टि से ख्यातों को दो भागों में बाँटा जा सकता है :

  1. संलग्न ख्यात – ऐसी ख्यातों में क्रमानुसार इतिहास लिखा हुआ होता है, जैसे: दयालदास री ख्यात(इसमें बीकानेर के राव बीकाजी से लेकर महाराजा अनूपसिंह तक का इतिहास संचित है।)।
  2. बातसंग्रह – ऐसी ख्यातों में अलग-अलग छोटी या बड़ी बातों द्वारा इतिहास के तथ्य लिखे हुए मिलते हैं, जैसे: नैणसी री ख्यात एवं बाँकीदास री ख्यात।

रूपक

किसी वंश अथवा व्यक्ति विशेष की उपलब्धियों के स्वरूप को दर्शाने वाली काव्य कृति रूपक कहलाती है। प्रमुख रूपक काव्य

  • गजगुणरूपक
  • रूपक गोगादेजी रो
  • राजरूपक

कक्का

कक्का उन रचनाओं को कहते हैं, जिनमें वर्णमाला के बावन वर्ण में से प्रत्येक वर्ण से रचना का प्रारम्भ किया जाता है।

बही

एक विशेष प्रकार की बनावट का रजिस्टर जिसमें इतिहास सम्बन्धी कई उपयोगी सामग्री दर्ज की हुई मिलती हैं को बही कहते हैं । राव व बड़वे अपनी बही में आश्रयदाताओं के नाम और उनकी मुख्य उपलब्धियों का ब्यौरा लिखते थे।
इसी प्रकार ‘राणी मंगा’ जाति के लोग कुँवरानियों व ठकरानियों के नाम और उनकी संतति का विवरण अपनी बही में लिखते थे। यह कार्य पीढ़ी दर पीढ़ी चलता रहता था। प्रमुख रचनाएँ :

  • चित्तौड़-उदयपुर पाटनामा री बही
  • पाबूदान री बही
  • जोधपुर राणी मंगा री बही

वचनिका

‘वचनिका’ शब्द संस्कृत के ‘वचन’ शब्द से बना है। यह गद्य पद्य मिश्रित काव्य विधा के रूप में राजस्थानी साहित्य में प्रचलित हुआ है। इसमें अंत्यानुप्रास मिलता है, यद्यपि इसके अपवाद भी मिलते हैं।
राजस्थानी साहित्य की प्रमुख वचनिकाएँ :

  • अचलदास खींची री वचनिका – शिवदास गाडण
  • राठौड़ रूपसिंह जी री वचनिका
  • राठौड़ रतनसिंह महेसदसौत री वचनिका – खिड़िया जग्गा

इसके 2 भेद होते है :
पद्यबद्ध – इसमें आठ-आठ अथवा बीस-बीस मात्राओं के तुकयुक्त पद होते है।
गद्यबद्ध – इसमें मात्राओं का नियम लागू नहीं होता है।

परची

संत-महात्माओं का जीवन परिचय में जिस पद्यबद्ध रचना में मिलता है उसे परची कहा गया है। इसमें संतों से सम्बंधित जानकारी जैसे – नाम, जाति, माता-पिता एवं अन्य सम्बन्धियों का नाम व उनकी साधनागत उपलब्धियों का वर्णन मिलता है। प्रमुख परची रचनाएँ :

  • संत नामदेव री परची
  • कबीर री परची
  • संत रैदास री परची
  • संत पीपा री परची
  • संत दादू री परची
  • मीराबाई री परची

दवावैत

दवावैत कलात्मक गद्य का एक अन्य रूप है, जो वचनिका काव्य रूप की तरह ही है। वचनिका राजस्थानी में लिखी होती है, जबकि दवावैत में उर्दू और फारसी की शब्दावली प्रयुक्त होती है। इनमें कथा के नायक का गुणगान, राज्य-वैभव, युद्ध, आखेट, नखशिख आदि का वर्णन तुकान्त और प्रवाहयुक्त होता है।
प्रमुख दवावैत ग्रंथ:

  • अखमाल देवड़ा री दवावैत
  • महाराणा जवानसिंह री दवावैत
  • राजा जयसिंह री दवावैतआदि हैं।

रासो

वीरता परक काव्यों को रासो कहते है। इनकी रचना राजा के आश्रय में की गई थी। मोतीलाल मेनारिया के अनुसार, “जिस काव्य ग्रंथ में किसी राजा की कीर्ति, विजय, युद्ध, वीरता आदि का विस्तृत वर्णन हो, उसे रासो कहते हैं।” प्रमुख रासो ग्रन्थ

  • पृथ्वीराज रासो – चन्द्रबरदाई
  • सलदेव रासो – नरपति नाल्ह
  • सगत रासो – गिरधर आसिया
  • खुमाण रासो – दौलत विजय
  • रतन रासो – कुम्भकर्ण
  • हम्मीर रासो – जोधराज
  • क्यामखां रासो -कवि जान
  • जवान रासो – सीताराम रत्नू
  • बिन्है रासो – राव महेशदास
  • बीसलदेव रासौ – नरपति नाल्ह

वात

कहानी का पर्याय ‘वात’ कहने और सुनने की विशेष विधा है। कथा कहने वाला कहता चलता है और सुनने वाला ‘हुँकारा’ देता रहता है। इस शैली में जीवन के हर पक्ष, युद्ध, धर्म, दर्शन, मनोरंजन पर प्रकाश डाला गया हैं। वातें गद्यमय, पद्यमय तथा गद्य-पद्यमय तीनों रूपों में मिलती हैं।
इस शैली की प्रमुख रचनाएँ :

  • राव अमरसिंहजी री वात
  • खींचियां री वात
  • तुंवरा की वात
  • चुण्डावत री वात
  • पाबूजी री वात
  • कान्हड़दे री वात
  • अचलदास खींची री वात
  • बीजड बिजोगड़ ऋ वात

झमाल

झमाल राजस्थानी काव्य का मात्रिक छन्द है। इसमें पहले पूरा दोहा, फिर पांचवें चरण में दोहे के अंतिम चरण की पुनरावृति की जाती है। छठे चरण में दस मात्राएँ होती है। इस प्रकार दोहे के बाद चांद्रायण फिर उल्लास छंद रखकर सिंहावलोकन रीति से पढ़ा जाता है। ‘राव इन्द्रसिंह री झमाल’ प्रसिद्ध है।

झूलणा

झूलणा राजस्थानी काव्य का मात्रिक छन्द है। इसमें चौबीस अक्षर के वर्णिक छन्द के अंत में यगण होता है। प्रमुख झूलणा काव्य रचनाएँ:

  • अमरसिंह राठौड़ रा झूलणा
  • राजा गजसिंह-रा-झूलणा
  • राव सुरताण-देवड़े-रा-झूलणा

विगत

विगत से किसी विषय का विस्तृत विवरण प्राप्त होता है। इसमें इतिहास की दृष्टि से शासक, उसके परिवार, राज्य के क्षेत्र प्रमुख व्यक्ति अथवा उनके राजनीतिक, सामाजिक व्यक्तित्व का वर्णन मिलता है। विगत में उपलब्ध आंकड़े तत्कालीन आर्थिक-सामाजिक परिस्थितियों को जानने की दृष्टि से उपयोगी रहे हैं।

  • मारवाड़ रा परगनां री विगत – मुहणोत नैणसी की इस रचना में प्रत्येक परगने की आबादी, रेख, भूमि किस्म, फसलों का हाल, सिंचाई के साधन आदि की जानकारियां प्राप्त होती हैं।

वेलि

ऐतिहासिक वेलि ग्रंथ ‘वेलियो’ छन्द में लिखे हुए हैं। इसमें राजा-महाराजा, सामंतों आदि की वीरता, स्वामिभक्ति, विद्वता, वंशावली आदि का उल्लेख मिलता है। इनके विविध विषय रहे है, जो धार्मिक, ऐतिहासिक रहे हैं। प्रमुख वेलि रचनाएँ :

  • दईदास जैतावत री वेलि
  • रतनसी खीवावत री वेलि
  • राव रतन री वेलि
  • वेलि किसण रूकमणी री – यह पृथ्वीराज राठौड़ द्वारा रचित वेलि परंपरा की प्रमुख रचना है।

बारहमासा

बारहमासा में कवि वर्ष के प्रत्येक मास की परिस्थितियों का चित्रण करते हुए नायिका का विरह वर्णन करते है इसका वर्णन प्राय:आषाढ़ से प्रारम्भ होता है।

प्रकास

किसी वंश अथवा व्यक्ति विशेष की उपलब्धियों या घटना विशेष पर प्रकाश डालने वाली कृतियों को प्रकास कहा गया है। प्रमुख रचनाएँ :

  • राजप्रकास – किशोरदास आशिया
  • महायश प्रकास – मानसिंह
  • पाबू प्रकास – मोडा आशिया
  • सूरज प्रकास – कविया करणीदान
  • भीम प्रकास – रामदान लालसा

साखी


साखी साक्षी शब्द से बना है। इसका अर्थ है ‘आँखों देखि बात का वर्णन करना’ साखी परक रचनाओं में संत कवियों ने अपने द्वारा अनुभव किये गये ज्ञान का वर्णन किया है। इसमें सोरठा छन्द का प्रयोग हुआ है। कबीर की साखियां प्रसिद्ध हैं।

सिलोका

सिलोका संस्कृत शब्द श्लोक का बिगड़ा हुआ रूप है। राजस्थानी भाषा में धार्मिक,ऐतिहासिक और उपदेशात्मक सिलोके लिखे मिलते है। ये साधारण पढ़े-लिखे लोगों द्वारा लिखे गये हैं, इसलिए ये जनसाधारण की भावनाओं को आमजन तक पहुँचाते हैं। प्रमुख रचनाएँ :

  • राव अमरसिंह रा सिलोका
  • अजमालजी रो सिलोको
  • राठौड़ कुसलसिंह रो सिलोको
  • भाटी केहरसिंह रो सिलोको

दूहा

राजस्थान के वीर तथा दानी पुरुषों पर अनेकों दोहे लिखे गए जिनसे उनके साहस, धैर्य, त्याग, कर्तव्यपरायणता, दानशीलता तथा ऐतिहासिक घटनाओं की जानकारी मिलती है। मुख्य रचनाएँ :

अखैराज सोनिगरै रा दूहा
अमरसिंघ गजसिंघोत रा दूहा
करण संगतसिंघोत रा दूहा
कान्हड़दे सोनिगरै रा दूहा

मरस्या

मरस्य से तात्पर्य ‘शोक काव्य’ से है। किसी व्यक्ति विशेष की मृत्यु के पश्चात् शोक व्यक्त करने के लिए ‘मरस्या’ काव्यों की रचना की जाती थी। इसमें उस व्यक्ति के चारित्रिक गुणों के अतिरिक्त अन्य महान कार्यो का वर्णन भी किया जाता था।प्रमुख रचनाएँ :

  • राणे जगपत रा मरस्या – यह मरस्य मेवाड़ महाराणा जगतसिंह की मृत्यु पर शोक प्रकट करने के लिए लिखा था

प्रशस्ति

राजस्थान में मंदिरों, दुर्गद्वारों, कीर्तिस्तम्भों आदि पर राजाओं की उपलब्धियों का प्रशंसायुक्त वृत्तान्त मिलता है जिसे प्रशस्ति कहते हैं। प्रशस्तियों में राजाओं का वंशक्रम, युद्ध अभियानों, पड़ोसी राज्यों से संबंध, उनके द्वारा निर्मित मंदिर, जलाशय, बाग-बगीचों, राजप्रासादों आदि का वर्णन मिलता है। इनसे तत्कालीन समय की राजनैतिक, धार्मिक एवं सांस्कृतिक दशा का ज्ञान होता है।
प्रशस्तियों में यद्यपि अतिश्योक्तिपूर्ण वर्णन मिलता है, फिर भी इतिहास निर्माण में ये उपयोगी है। प्रमुख रचनाएँ :

प्रशस्ति टिप्पणीउत्कीर्ण स्थानशासकरचयिताकाल
नेमिनाथ मंदिर की प्रशस्ति अन्य नाम लूणवसही प्रशस्तिमाउण्ट आबू के देलवाड़ा गाँवपरमार वेशीय शासकोंतेजपाल1230 ई. 
रणकपुर प्रशस्तिमेवाड़ के शासक बप्पा रावल से लेकर कुंभा  तक के शासकों का वर्णनपाली जिले के रणकपुर गाँव में चौमुखा मंदिर के स्तम्भ  मेवाड़ के शासक देपाक (दीपा या देवाक) 1439 ई.
राज प्रशस्ति 25 काले पाषाणों की शिलाओं पर उत्कीर्ण विश्व की सबसे बड़ी प्रशस्ति या अभिलेख है।राजसमंद झील की नौ चौकी पाल पर राजसिंहरणछोड़ भट्ट तैलंग1676 ई.
रायसिंह प्रशस्ति अन्य नाम बीकानेर दुर्ग की प्रशस्ति तथा जूनागढ़ प्रशस्तिबीकानेररायसिंहजैन मुनि जइता1594 ई.
कीर्तिस्तम्भ प्रशस्ति महाराणा कुंभा के द्वारा लिखी गई पुस्तक तथा उपाधियों की जानकारी मिलती है। चित्तौड़गढ़ दुर्ग के कीर्ति स्तम्भ मेंमहाराणा कुंभाकवि अत्रि व उनका पुत्र महेश भट्ट1460 ई. 



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