बैसाख मास

बैसाख मास

हिन्दू कैलेंडर के अनुसार बैसाख मास वर्ष का दूसरा माह है। अंग्रेजी कैलेंडर के अनुसार यह अप्रेल-मई महीने में आता है। इस माह को एक पवित्र माह के रूप में माना जाता है। इसमें गंगा या सरोवर स्नान का विशेष महत्व है । पौराणिक मान्यताओं के अनुसार बैसाख मास की शुक्ल पक्ष को अक्षय तृतीया के दिन विष्णु के अनेक अवतारों नर-नारायण, परशुराम, नृसिंह और ह्ययग्रीव ने अवतार लिया और शुक्ल पक्ष की नवमी को देवी सीता धरती से प्रकट हुई। त्रेतायुग की शुरुआत भी वैशाख माह से ही मानी जाती है। इस माह की पवित्रता और दिव्यता के कारण ही कालान्तर में बैसाख मास की तिथियों का सम्बंध लोक परंपराओं में अनेक देव मंदिरों के पट खोलने और महोत्सवों के मनाने के साथ जोड़ दिया। यही कारण है कि हिन्दू धर्म के चार धाम में से एक बद्रीनाथधाम के कपाट वैशाख माह की अक्षय तृतीया को खुलते हैं। इसी माह की शुक्ल पक्ष की द्वितीया को एक और हिन्दू तीर्थ धाम पुरी में भगवान जगन्नाथ की रथयात्रा भी निकलती है। साल में केवल एक बार श्री बांके बिहारी जी के चरण दर्शन भी इसी महीने में होते हैं। लोक जीवन में मंगल कार्य की शुरुआत इसी महीने से होती हैं।

सभी हिन्दू महीनों की तरह बैसाख मास में भी दो पक्ष, कृष्ण पक्ष व शुक्ल पक्ष सम्मिलित है।

कृष्ण पक्षशुक्ल पक्ष
एकादशी – बरुथिनी एकादशी
वरुथिनी एकादशी को भगवान विष्णु का व्रत व उपासना की जाती है। इसे समस्त पापों का नाश करने वाला और मनोकामना पूर्ति करने वाला व्रत माना जाता है।
तृतीया – अक्षय तृतीया/ आखा तीज
बैसाख मास की शुक्ल पक्ष की तृतीया को अक्षय तृतीया कहते हैं। माना जाता है की इस दिन जो भी शुभ कार्य किये जाते हैं, उनका अक्षय फल मिलता है। इसका सर्वसिद्ध मुहूर्त के रूप में विशेष महत्व है। मान्यता है कि इस दिन बिना कोई पंचांग देखे कोई भी शुभ व मांगलिक कार्य जैसे विवाह, गृह-प्रवेश, वस्त्र-आभूषणों की खरीददारी या घर, भूखण्ड, वाहन आदि की खरीददारी से सम्बन्धित कार्य किए जा सकते हैं।
तृतीया – परशुराम जयंती
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार इस दिन विष्णु के उन्नीसवें अवतार परशुराम जी का जन्म हुआ था। वे शस्त्रविद्या के महान गुरु थे। उन्होंने भीष्म, द्रोण व कर्ण को शस्त्रविद्या प्रदान की थी।
सप्तमी – गंगा सप्तमी
पौराणिक शास्त्रों के अनुसार वैशाख मास की शुक्ल पक्ष की सप्तमी को मां गंगा स्वर्ग लोक से शिवशंकर की जटाओं में पहुंची थी। इसलिए इस दिन को गंगा सप्तमी के रूप में मनाया जाता है। जिस दिन गंगा जी की उत्पत्ति हुई वह दिन गंगा जयंती (वैशाख शुक्ल सप्तमी) और जिस दिन गंगाजी पृथ्वी पर अवतरित हुई उस दिन गंगा दशहरा (ज्येष्ठ शुक्ल दशमी) मनाया जाता है।
नवमी – सीता नवमी
माता सीता का प्राकट्य दिवस।
एकादशी – मोहनी एकादशी
मोहिनी एकादशी के दिन भगवान विष्णु के मोहिनी स्वरूप की पूजा की जाती है।
चतुर्दशी – नरसिंह जयंती
धार्मिक कथाओं के अनुसार इस दिन भगवान विष्णु के चौथे अवतार नरसिंह ने दैत्यों के राजा हिरण्यकश्यप से अपने भक्त प्रहलाद की रक्षा हेतु आधे नर और आधे सिंह के रूप में अवतार लिया था।
पूर्णिमा – बुद्ध पूर्णिमा
पीपल पूर्णिमा

धींगा गवर का बेंतमार मेला, जोधपुर

पश्चिमी राजस्थान में जोधपुर, बीकानेर, जैसलमेर आदि क्षेत्रों में सुहागिनें अखंड सुहाग की कामना के लिए धींगा गवर की पूजा करती है। यह पूजा सामान्यतः गणगौर पूजा के बाद चैत्र शुक्ल तृतीय से बैसाख कृष्ण पक्ष की तृतीया तक होती है। धींगा गवर के रतजगे पर जोधपुर शहर में बेंतमार मेले का माहौल होता है। इस मेले में स्त्रियां अपने घरों से विभिन्न स्वांग जैसे राजा-रानी, डॉक्टर, पुलिस, वकील, जाट-जाटनी, विष्णु, महादेव, भिखारी, सेठ इत्यादि नाना प्रकार के भेष धारण कर मुखौटे लगाकर नाचती गाती हाथों में लंबा बेंत या इंडा लेकर धींगा गवर स्थल पर जाती हैं। जब ये महिलाएं स्वांग रच कर रात्रि में सड़क पर निकलती हैं तो रास्ते में जहाँ भी पुरुष नजर आता है, उसे बेंत से पीटती हैं। मान्यता है कि इस मेले में बेंत खाने से कुंवारे युवकों की शादी जल्दी हो जाती है।

डिग्गी कल्याण जी का मेला, टोंक

जयपुर से लगभग पिचहत्तर किलोमीटर दूर टोंक जिले की मालपुरा तहसील में भगवान विष्णु के स्वरूप कल्याण जी का मंदिर स्थित है। यहाँ वर्ष में 3 बार श्रावण माह की अमावस्या को, बैसाख पूर्णिमा को तथा भाद्रपद मास की एकादशी को मेला लगता है। कल्याण जी के बहुत सारे भक्त अपनी मनोकामना पूर्ण होने की प्रार्थना के साथ जयपुर से डिग्गी तक की पैदल यात्रा भी करते हैं। डिग्गी कल्याण जी की बहुत अधिक मान्यता है और यह मान्यता प्रदेश की सीमाओं से बाहर बिहार, बंगाल और आसाम तक व्याप्त है।

भर्तृहरि का मेला, अलवर

अलवर से लगभग चालीस किलोमीटर दूर बाबा भर्तृहरि की समाधि है, जहाँ वर्ष में दो बार बैसाख मास में और भाद्रपद शुक्ल सप्तमी-अष्टमी को मेला लगता है। कहा जाता है कि उज्जैन के राजा गोपीचन्द भर्तृहरि बहुत बड़े राजपाट के स्वामी थे। तथा उनकी पत्नी रानी पिंगला अतीव सुन्दरी थी। किसी कारण राजा के मन में विरक्ति आ गई और उन्होंने अपना राजपाट त्याग कर सन्यास ले लिया। जगह-जगह विचरण करने वाले भर्तहरि बाबा को यह जंगल बहुत अच्छा लगा और वे मृत्यु पर्यन्त यहीं रहे। यहीं उनकी समाधि भी बनाई गई। तीन तरफ सुरम्य पहाड़ियों से घिरे इस स्थान पर एक झरना भी बहता है।अपना नया काम शुरू करने और संकट निवारण के लिए श्रद्धालु बाबा का भण्डारा भी बोलते हैं। मेले में मुख्यतः मीणा, गुज्जर, अहीर, जाट तथा बागड़ा जाती के लोग पहुँचते है। मेले के दौरान यहां कुम्भ मेले जैसा वातावरण बन जाता है।

सीताबाड़ी का मेला, बारां

बारां जिले की शाहबाद तहसील के केलवाडा गाँव के निकट सीताबाडी में वैशाख पूर्णिमा से ज्येष्ठ अमावस्या(बड़ पूजनी अमावस्या) तक 15 दिवसीय मेला लगता है। यह दक्षिण पूर्वी राजस्थान में रहने वाली सहरिया जनजाति का सबसे बड़ा मेला है इसे सहरिया जनजाति के कुम्भ के रूप में जाना जाता है। इस मेले में सहरिया जनजाति के युवक व युवतियों के स्वयंवर का आयोजन भी किया जाता है।
किंवंदती के अनुसार नगरवासियों द्वारा सीता जी के चरित्र पर शक करने पर जब श्री राम ने सीता जी का परित्याग कर दिया था तब लक्ष्मण उन्हें इसी स्थान पर वाल्मीकि आश्रम में छोड़ गए थे। यहीं पर उनके पुत्रों लव व कुश का जन्म हुआ था। यहाँ स्थित तीन कुण्डों सीताकुण्ड, लक्ष्मणकुंड और सूरजकुंड में स्नान करना, गंगा स्नान के समकक्ष माना जाता है।

वैशाख मास में लगने वाले अन्य मेले

मेलास्थानतिथि
धींगागवर बेंतमार मेलाजोधपुरवैशाख कृष्णा तृतीया
गेर मेलासियावा (आबूरोड, सिरोही)वैशाख शुक्ला चतुर्थी
नारायणी माता मेलासरिस्का (अलवर)वैशाख शुक्ला एकादशी
बाणगंगा मेलाविराटनगर (जयपुर)वैशाख पूर्णिमा
गोमती सागर मेलाझालरापाटन (झालावाड़)वैशाख पूर्णिमा
मातृकुण्डिया मेलामातृकण्डिया (चित्तौड़गढ़)वैशाख पूर्णिमा
गौतमेश्वर मेलागौतमेश्वर (अरनोद, प्रतापगढ़)वैशाख पूर्णिमा
मारकंडेश्वर मेला अन्जारी गाँव, सिरोहीवैशाख पूर्णिमा

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