चैत्र मास

चैत्र मास

हिन्दू कैलेंडर के अनुसार चैत्र मास वर्ष का प्रथम माह है। यह वसंत ऋतु में आता हैं। अंग्रेजी कैलेंडर के अनुसार यह मार्च-अप्रैल महीने में आता है। चैत्र मास की प्रतिपदा तिथि से ही हिन्दू नववर्ष की शुरुआत होती है। विक्रम संवत की चैत्र शुक्ल की पहली तिथि से नवरात्रि में दुर्गा व्रत-पूजन का आरंभ होता है। चैत्र के नवरात्री का काफी महत्त्व है आज भी बहीखाते का नवीनिकरण और मंगल कार्य की शुरुआत इसी माह में होती है। ज्योतिष विद्या में ग्रह, ऋतु, मास, तिथि एवं पक्ष आदि की गणना भी चैत्र प्रतिपदा से ही की जाती है।

  • ईरान में इस तिथि को ‘नौरोज’ यानी ‘नया वर्ष’ मनाया जाता है। आंध्र में यह पर्व ‘उगादिनाम’ से मनाया जाता है। उगादिका अर्थ होता है युग का प्रारंभ, अथवा ब्रह्मा की सृष्टि रचना का पहला दिन।
  • इस प्रतिपदा तिथि को ही जम्मू-कश्मीर में ‘नवरेह’, पंजाब में वैशाखी, महाराष्ट्र में ‘गुडीपड़वा’, सिंध में चेतीचंड, केरल में ‘विशु’, असम में ‘रोंगली बिहू’ आदि के रूप में मनाया जाता है।
  • विक्रम संवत की चैत्र शुक्ल की पहली तिथि से नवरात्रि में दुर्गा व्रत-पूजन का आरंभ होता है, बल्कि राजा रामचंद्र का राज्याभिषेक, युधिष्ठिर का राज्याभिषेक, सिख परंपरा के द्वितीय गुरु अंगददेव का जन्म हुआ था।
चैत्र मास कृष्ण पक्षचैत्र मास शुक्ल पक्ष
प्रतिपदा – होली(धुलंडी)
फाल्गुन माह की पूर्णिमा को होलिका दहन कर होली मनाई जाती है इसके अगले दिन चैत्र कृष्ण एकम को रंगों का त्यौहार होली धुलंडी मनाई जाती है।
प्रतिपदा – नव सम्वत्सर (नया वर्ष)
हिन्दू धर्म में नव वर्ष चैत्र शुक्ल एकम (चेत्र प्रतिपदा) को मनाया जाता है।
प्रतिपदा – चैत्र नवरात्रा
हिन्दु धर्म में साल में चार नवरात्रि मनाई जाती हैं। इसमें पहली नवरात्रि माघ में मनाई जाती है, जिसे गुप्त नवरात्रि कहा जाता है। दूसरी नवरात्रि चैत्र में मनाई जाती है, जिसे चैत्र नवरात्रि कहा जाता है। तीसरी नवरात्रि आषाढ़ में मनाई जाती है, जिसे गुप्त नवरात्रि कहा जाता है। जबकि चौथी और अंतिम नवरात्रि अश्विन माह में मनाई जाती है, जिसे शारदीय नवरात्रि कहा जाता है।
पौराणिक मान्यता के अनुसार जब धरती पर महिषासुर नमक राक्षस का आतंक काफी बढ़ गया और देवता भी उसे हरा पाने में असमर्थ हो गए, क्योंकि महिषासुर को सृष्टि कर्ता ब्रह्मा द्वारा वरदान प्राप्त था की कोई भी देवता या दानव उसपर विजय प्राप्त नहीं कर सकता| ऐसे में देवताओं ने माता पार्वती को प्रसन्न कर उनसे रक्षा का अनुरोध किया | इसके बाद मातारानी ने अपने अंश से नौ रूप प्रकट किए, जिन्हें देवताओं ने अपने शस्त्र देकर शक्ति संपन्न किया| ये क्रम चैत्र के महीने में प्रतिपदा तिथि से शुरू होकर 9 दिनों तक चला, तब से इन नौ दिनों को चैत्र नवरात्रि के तौर पर मनाया जाने लगा
तृतीया – गणगौर
चैत्र कृष्ण प्रतिपदा से चैत्र शुक्ल तृतीया तक यह त्यौहार मनाया जाता है।चैत्र शुक्ल तृतीया को मुख्य त्यौहार मनाया जाता है। इस दिन कुँवारी लड़कियाँ मनपसन्द वर पाने की कामना से एवं विवाहित महिलाएँ अपने पति की दीर्घायु की कामना से शिवजी (इसर जी) और पार्वती जी (गौरी) की पूजा करती हैं। किवंदती है यह त्यौहार पार्वती के गौने से अपने पिता के घर वापस लौट आने परसखियों द्वारा स्वागत गान के रूप में हुआ। यह सर्वाधिक लोकगीतों वाला त्यौहार है|
जयपुर व उदयपुर की गणगौर प्रसिद्ध है। जेम्स टॉड ने उदयपुर की गणगौर का वर्णन किया है।
राजस्थान में बूंदी में यह त्यौहार नहीं मनाया जात है क्योंकि बूंदी के शासक बुद्धसिंह का भाई जोधसिंह गणगौर त्यौहार मनाते समय नौका सहित डूब गया था।
जोधपुर में भी 1491 ई. से गणगौर की पूजा बन्द कर दी गई क्योंकि जोधपुर शासक ‘राव सातल’ की मृत्यु इसी दिन तीजणियों को अजमेर के सूबेदार ‘मूल्लू खाँ’ से बचाने पर घायल होने से हो गई।
तृतीया – घुड़ला त्यौहार
मारवाड़ के जोधपुर, बाड़मेर, जैसलमेर आदि जिलों में चैत्र कृष्ण अष्टमी(शीतला अष्टमी) से चैत्र शुक्ला तृतीया तक यह त्यौहार मनाया जाता है। घुड़ला एक छिद्रित घड़ा होता है जिसमें दीपक जला कर रखा होता है। बालिकाएं समूह में कुम्हार के यहां जाकर घुड़ला और चिड़कली लाती हैं फिर इसमें कील से छोटे-छोटे छिद्र कर इसमें दीपक जला कर रखती है। इस घुड़ले को सर पर रखकर घुड़ला व गवर के मंगल लोकगीत गाती हुई सुख व समृद्धि की कामना से गाँव या शहर की गलियों में इसे घुमाती है। जहाँ से घुड़ला गुजरता है वहां महिलाएं माटी के घुड़ले के अंदर जल रहे दीपक के दर्शन करके सभी कष्टों को दूर करने तथा घर में सुख शांति बनाए रखने की मंगल कामना व प्रार्थना करते हुए घुड़ले पर चढ़ावा चढ़ाती हैं। घुड़ला घुमाने का सिलसिला शीतला अष्टमी से चैत्र नवरात्रि के तीज पर आने वाली गणगौर तक चलता है। इस दिन गवर को घुइले के साथ विदाई दी जाती है उसे पानी में विसर्जित कर दिया जाता है। इस त्यौहार से सम्बंधित एक राजस्थानी लोकनृत्य घुड़ला भी विख्यात है।
पंचमी – गुलाबी गणगौर
चुंदड़ी गणगौर
यह त्यौहार नाथद्वारा में मनाया जाता है।
सप्तमी व अष्टमी – शीतला सप्तमी व अष्टमी(बास्योड़ा)
चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की सप्तमी व अष्टमी को शीतला माता के व्रत और पूजन किये जाते हैं। शीतलाष्टमी के एक दिन पूर्व राँधा पुआ मनाया जाता है जिसमे माता को भोग लगाने के लिए तरह तरह के पकवान यानि बसौड़ा तैयार कर लिया जाता है। सप्तमी अथवा अष्टमी जब भी पूजन करते है यही बसौड़ा देवी को नैवेद्य के रूप में समर्पित किया जाता है और भक्तों के बीच प्रसाद के रूप में वितरित किया जाता है। इस कारण से ही संपूर्ण उत्तर भारत में शीतलाष्टमी त्यौहार, बसौड़ा के नाम से विख्यात है। ऐसी मान्यता है कि इस दिन के बाद से बासी खाना खाना बंद कर दिया जाता है। ये ऋतु का अंतिम दिन होता है जब बासी खाना खा सकते हैं।
नवमी – राम नवमी
हिंदू धर्मशास्त्रों के अनुसार इस दिन भगवान विष्णु के सातवें अवतार मर्यादा-पुरूषोत्तम भगवान श्री राम जी का जन्म हुआ था। रामनवमी के दिन ही चैत्र नवरात्र की समाप्ति भी हो जाती है। अत: इस शुभ तिथि को भक्त लोग पवित्र नदियों में स्नान करके पुण्य के भागीदार बनते है।
एकादशी – पापमोचिनी एकादशीनवमी – स्वामी नारायण जयंती
एकादशी – कामदा एकादशी
पूर्णिमा – हनुमान जयंती

तिलवाड़ा का मेला, बाड़मेर

बाड़मेर के तिलवाड़ा में मल्लिनाथ जी की स्मृति में चैत्र कृष्ण एकादशी से चैत्र शुक्ल एकादशी तक पशुमेले का आयोजन किया जाता है। राज्य के सभी क्षेत्रों से व्यापारी यहाँ पहुँचते है। मेले में गायों की थारपाकर, राठी, मालाणी, कांकरेज नस्लों की गायें विक्रय के लिए आती है।

शीतला माता का मेला, (चाकसू, जयपुर)

जयपुर जिले की चाकसू तहसील में स्थित शील की डूंगरी गाँव में चैत्र कृष्णा सप्तमी अष्टमी को शीतला माता का मेला लगता है। पहाड़ी पर स्थित शीतला माता के मंदिर का निर्माण जयपुर के शासक माधोसिंह ने करवाया था। दूर-दूर से ग्रामीण रंगीन कपड़ों में सजे, अपनी सुसज्जित बैलगाड़ियों से मेले में आते हैं, इसलिए इसे ‘बैलगाड़ी मेले’ के नाम से जाना जाता है। शील माता का पुजारी कुम्हार जाती का ही होता है। इस अवसर पर पशु मेले का आयोजन भी किया जाता है।
शीतला माता को मातृरक्षिका देवी के रूप में पूजा जाता है। स्कंद पुराण में शीतला देवी का वाहन गर्दभ बताया गया है। ये हाथों में कलश, सूप, मार्जन (झाडू) तथा नीम के पत्ते धारण करती हैं। इन्हें चेचक आदि कई रोगों की देवी बताया गया है। उत्तर भारत में इन्हे ‘महामाई’, पश्चिम भारत में ‘माई अनामा’ और राजस्थान में सेढ, शीतला तथा सैढल माता के रूप में जाना जाता है। शीतला माता को बच्चों की संरक्षिका माना जाता है।। ऐसी मान्यता है कि चेचक का प्रकोप माता की रुष्टता के कारण ही होता है।

केसरियाजी का मेला, उदयपुर

उदयपुर के धुलेव गाँव में ऋषभदेवजी का भव्य मंदिर है। प्रतिवर्ष अश्विन कृष्ण प्रथम व द्वितीय को यहाँ भव्य रथयात्रा भी निकाली जाती है। चैत्र कृष्ण अष्टमी को यहाँ विशाल मेले का आयोजन होता है इस मेले में श्वेताम्बर,दिगंबर जैन, वैष्णव, शेव, भील व मुस्लिम सम्प्रदाय के लोग सम्मिलित होते है। ऋषभदेवजी की मूर्ति काले रंग की होने के कारण भील इन्हे कालाजी कहते है। इनकी पूजा में केसर का विशेष महत्त्व होने से इन्हे केसरियाजी भी कहा जाता है।

श्रीमहावीरजी मेला, करौली

जैन धर्म के चौबीसवें तीर्थंकर महावीर स्वामी की स्मृति में करौली जिले की हिण्डौन तहसील में गंभीरी नदी तट पर स्थित चंदन गाँव में चैत्र शुक्ला त्रयोदशी से वैशाख कृष्णा प्रतिपदा तक महावीरजी का मेला लगता है। देश के विभिन्न हिस्सों से जैन धर्मानुयायी यहाँ पहुँचते हैं। जैनियों के साथ-साथ मीणा, गुर्जर, जाट, अहीर, चर्मकार आदि जातियों के लोग भी इसमें सम्मिलित होते हैं।
पौराणिक मान्यता के अनुसार सत्रहवीं शताब्दी में चंदन गाँव के एक चर्मकार की गाय का दूध स्वतः ही एक टीले पर निकल जाता था। उस टीले की खुदाई करने पर, पत्थर की मँगा वर्ण(लाल रंग) की महावीर की प्रतिमा मिली। इसी स्थान पर मंदिर बनाकर मूर्ति स्थापित कर दी गई। मेले के दौरान रथयात्रा प्रारम्भ होने से पूर्व आज भी चर्मकार ग्वाले के वंशज सम्मानित किये जाते हैं।
वैशाख कृष्ण प्रतिपदा को भगवान महावीर स्वामी की रथयात्रा निकाली जाती है। स्वर्णिम रथ पर आरूढ़ भगवान महावीर की प्रतिमा को एक भव्य जुलूस के रूप में कलश अभिषेक के लिए गम्भीरी नदी के तट पर ले जाया जाता है। रथ का संचालन हिण्डौन के उपजिला कलेक्टर राज्य सरकार के प्रतिनिधि के रूप में सारथी बनकर करते हैं। रथयात्रा में रथ के आगे मीणा जाति के लोग लोकगीत गाते हुए चलते हैं तथा वापसी में उनका स्थान गुर्जर ले लेते है। देश में महावीरजी का यह मेला अपने आप में अनूठा और सर्वधर्म की मिसाल है।

कैला देवी का मेला, करौली

करौली से 20 कि.मी. दूर त्रिकूट पर्वत की घाटी में कालीसिंध के तट पर कैला देवी का भव्य मंदिर है। यहाँ प्रतिवर्ष चैत्रमास की शुक्ल अष्टमी को मेला लगता है। जिसमें हजारों लाखों भक्त देवी के दर्शन करने आते हैं। मंदिर के मुख्य कक्ष में कैलादेवी व चमुंडादेवी की प्रतिमाएं प्रतिष्ठापित है। परिसर में एक हनुमान मंदिर भी बना हुआ है जिसे स्थानीय भाषा में लांगुरिया कहा जाता है। इस मेले का मुख्य आकर्षण लांगुरिया नृत्य है। इस अवसर पर यहाँ पशु मेला भी लगता है। राजस्थान के अतिरिक्त उत्तरप्रदेश, मध्यप्रदेश, पंजाब, दिल्ली, हरियाणा से भी भक्त इस मेले में पहुँचते है।

करणी माता का मेला, बीकानेर

बीकानेर जिले में देशनोक नामक स्थान पर करणी माता का मंदिर बना हुआ है, यहां वर्ष में दो बार चैत्र व अश्विन मास के नवरात्र के समय मेला लगता है।करणी माता का मंदिर देश-विदेश में चूहों वाला मंदिर के नाम से प्रसिद्ध है। यहां हजारों की संख्या में चूहें हैं, जिन्हें पवित्र माना जाता है और जिन्हें “काबा’ के नाम से पुकारा जाता है। श्रृद्धालुजन पहले प्रशाद का भोग चूहों को लगाते हैं उसके बाद व जन समुदाय में बांटतें हैं। यहां एक आस्था प्रचलित है कि यदि किसी भक्तगण को सफेद चूहे के दर्शन हो जाएं तो उस पर करणी माता की असीम कृपा होती है।

जीण माता का मेला, सीकर

सीकर जिले के रैवासा गाँव में हर्ष की पहाड़ी पर जीण माता का मंदिर स्थित है। यह मंदिर तीन दिशाओं में पर्वत श्रंखलाओं से घिरा हुआ है। मंदिर में जीण माता की अष्टभुजी प्रतिमा स्थापित है। जिसके सामने घी और तेल के दो दीपक अखण्ड रूप से कई वर्षों से जलते आ रहे हैं। कहा जाता है, कि इन दीपक ज्योतियों की व्यवस्था दिल्ली के चौहान राजाओं ने शुरू की थी बाद में यह जयपुर राज्य की ओर से की जाने लगी, जो जयपुर राज्य के अस्तित्व में रहने तक जारी रही। यह भी कहा जाता है कि कुछ समय के लिए पाण्डव भी यहाँ रहे थे। यहाँ पाँचों पाण्डवों की आदमकद प्रस्तर प्रतिमाएँ हैं। यहाँ वर्ष में दो बार चैत्र और आश्विन मास के नवरात्रों में मेला लगता है। इस मेले में राजस्थान के अतिरिक्त, बंगाल, बिहार, असम और गुजरात से हजारों तीर्थयात्री अपनी मनोकामना सिद्धि के लिए आते हैं। यहाँ देवी को सुरा का भोग लगाया जाता है। मुख्यतः राजपूत और मीणा जाति के लोग इस देवी की आराधना करते हैं।

मेलास्थान तिथि
फुलडोल मेलारामद्वारा (शाहपुरा,भीलवाड़ा)चैत्र कृष्ण प्रतिपदा से पंचमी तक
धानोप माता का मेला धनोप गाँव (भीलवाड़ा)चैत्र कृष्ण एकम् से दशमी तक
शीतला माता मेला शील डूंगरी (चाकसू, जयपुर)चैत्र कष्ण सप्तमी-अष्टमी
ऋषभदेव मेला ऋषभदेव (धुलेव,उदयपुर) चैत्र कृष्ण अष्टमी-नवमी
जौहार मेलाचित्तौड़गढ़ दुर्ग (चित्तौड़गढ़)चैत्र कृष्णा एकादशी
मल्लीनाथ पशु मेलातिलवाड़ा (बाड़मेर)चैत्र कृष्णा 11 से चैत्र शुक्ला 11 तक
घोटिया अम्बा मेलाघोटिया (बारीगामा, बांसवाड़ा)चैत्र अमावस्या
विक्रमादित्य मेला उदयपुर चैत्र अमावस्या
कैलादेवी मेलाकैलादेवी (करौली)चैत्र शुक्ला एकम् से दशमी तक
गणगौरजयपुर व उदयपुरचैत्र शुक्ला तीज
राम रावण मेलाबड़ीसादड़ी (चित्तौड़गढ़)चैत्र शुक्ला दशमी
महावीरजी मेलामहावीरजी (करोली)चैत्र शुक्ला 13 से वैशाख कृष्णा 2 तक
मेहंदीपुर बालाजी मेलामेंहदीपुर बालाजी चैत्र पूर्णिमा (हनुमान जयंती)
सालासर बालाजी मेलासालासर (सुजानगढ़, चुरू)चैत्र पूर्णिमा (हनुमान जयंती)
वीरातरा माता का मेलावीरातरा, बाड़मेरचैत्र भाद्रपद व माघ शुक्ला चौदस
करणी माता का मेलादेशनोक, बीकानेर नवरात्रा (चैत्र व आश्विन)
शाकम्भरी माता का मेलाशाकम्भरी, सांभरनवरात्रा (चैत्र व आश्विन)
दधिमति माता का मेलागोठ मांगलोद (नागौर) शुक्ला 8 (चैत्र व आश्विन)
मनसा माता का मेलाझुंझुनुचैत्र शुक्ला अष्टमी व आश्विन शुक्ला अष्टमी
बीजासन माता का मेलाइन्द्रगढ़, बूंदीनवरात्रा (चैत्र व आश्विन) तथा वैशाख पूर्णिमा
लोहार्गल मेलालोहार्गल, झुंझुनु
भाद्रपद कृष्णा नवमी से अमावस तथा चैत्र में सोमवती अमावस्या

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