राजस्थान की लोकदेवियाँ

राजस्थान की लोकदेवियाँ

राजस्थान की लोकदेवियाँ : राजस्थान के लोगों में लोकदेवियों की शक्ति के अवतार के रूप में बहुत मान्यता है। यहाँ जन्मी कई कन्याओं ने लोक कल्याणकारी कार्य कर अपने अलौकिक चमत्कारों से लोगो के दुःख-दर्द दूर किये थे। इन जनकल्याणकारी कन्याओं को यहाँ देवी रूप में प्रतिष्ठापित कर पूजनीय समझा गया। राजस्थान के कई क्षेत्रों में इनके मंदिर बनाये गए जहाँ लाखों की संख्या में लोग एकत्रित होते है इस लेख में हम राजस्थान में पूजनीय इन्ही देवी स्वरूपों का अध्यन करेंगे।

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करणी माता

करणी माता का जन्म जोधपुर जिले के सुआप गांव में मेहाजी जी चारण व देवलबाई के घर में हुआ था।कहा जाता है की देवलबाई ने 21 माह तक करणी माता को गर्भ में धारण किया था। इनके बचपन का नाम रिद्धि बाई था। करणी माता ने देशनोक कस्बे को बसाया जहाँ आज उनका मुख्य मंदिर स्थित है। इनके मूल मंदिर का निर्माण राव राजा जैतसिंह द्वारा 19वीं शताब्दी में करवाया गया था। तथा इसे भव्यता सूरतसिंह ने दी थी। इस मंदिर के प्रांगण व संगमरमर के दरवाज़े गंगासिंह जी ने बनवाये थे। इस मंदिर के पुजारी चारण समाज के लोग होते है। इस मंदिर प्रांगण में काफी संख्या में चूहे देखने को मिलते है इसी कारण इसे चूहों का मंदिर भी कहा जाता है। यहाँ काफी सारे काले चूहों में कुछ सफ़ेद चूहे भी हैं जिन्हे काबा कहा जाता है उनके दर्शन शुभ माने जाते है। मंदिर में स्थित दो विशाल कड़ाही का नाम सावन-भादो है।

करणी माता की इष्ट देवी तेमडेराय माता थी। इनका मंदिर भी देशनोक में स्थित है। धिनेरू तलाई बीकानेर में करणी माता की गुफा भी स्थित है। सफ़ेद चील को माताजी का प्रतीक माना जाता है। प्रतिवर्ष चैत्र व अश्विन के नवरात्रों में मंदिर में भव्य मेला लगता है जिसमे दूर-दूर से श्रद्धालु दर्शन करने आते है। जैसलमेर जिले के गाडियाली मठ को माताजी का निर्वाण स्थल कहा जाता है।

करणी माता के सम्बन्ध में कुछ तथ्य

बचपन का नामरिद्धिबाई
अन्य नामचूहों वाली देवी, दाढ़ी वाली डोकरी, राठौड़ों व चारणों की कुलदेवी
जन्म स्थान सुआप (जोधपुर)
कुल चारण
प्रमुख मंदिरदेशनोक(बीकानेर)
करणी माता मेलाचैत्र व अश्विन मास के नवरात्रों में
प्रतीक सफ़ेद चील- संवली
इष्ट देवी तेमडेराय माता

राजस्थान की लोकदेवियाँ: जीण माता

जीण माता का जन्म सीकर जिले के धांधू गाँव में चौहान वंश के राजपूत परिवार में हुआ था। जीण माता का मंदिर सीकर से 25 किलोमीटर दक्षिण में रेवासा गाँव के पास हर्ष की पहाड़ी पर स्थित है। इस मंदिर का निर्माण 1064 ई. में पृथ्वीराज चौहान (प्रथम) के शासन काल में सामंत हट्टड़ मोहिल ने करवाया था। यहाँ माता की अष्टभुजी प्रतिमा विराजमान है। जीण माता को ढाई प्याले शराब चढ़ती है। जीण माता के मंदिर के पास ही उनके भाई हर्ष का भी मंदिर है जिसका निर्माण चौहान राजा गूवल ने करवाया था।

जीण माता से जुड़ी लोक कथाएं

जीण माता का एक बड़ा भाई हर्ष था। एक बार जब जीण अपनी भाभी के साथ सरोवर से जल लेने गई तब ननद भाभी में इस बात को लेकर विवाद हो गया कि हर्ष किसे अधिक स्नेह करता है। तब यह तय हुआ कि घर पहुँचने पर हर्ष जिसके सर से पानी का मटका पहले उतारेगा वही हर्ष का अधिक प्रिय होगा। दोनों जब घर पहुंचे तो शर्त से अनजान हर्ष ने पहले अपनी पत्नी के सिर से मटका उतार दिया। इससे जीण नाराज हो गई और आरावली के एक पर्वत पर तपस्या करने लगी। हर्ष को जब शर्त की बात पता चली तो वह बहन को मनाने उसी पर्वत पर पहुंचा। लेकिन बहन ने घर लौटने से मना कर दिया। इससे हर्ष भी वहीं पहाड़ी पर भैरो की तपस्या करने लगा। तब से जीण माता के रूप में और हर्ष भैरों के रूप में वहां पूजित है।

जीण माता से जुडी एक और कथा है कहा जाता है की एकबार जब मुगल बादशाह औरंगजेब ने इन मंदिरों को तुड़वाने के लिए अपने सैनिकों को भेजा। तब गाँव वालों ने सैनिकों से मंदिर न तोड़ने की गुहार की पर बात न बनने पर गांव वालों ने माता की प्रार्थना की उसके बाद कहा जाता है कि माता के चमत्कार से मंदिर तोड़ने आये सैनिकों पर मधुमक्खियों का झुंड टूट पड़ा और वे अपनी जान बचाकर वहां से भाग खड़े हुए। इसके बाद से लोगों की श्रद्धा और भी ज्यादा हो गई। इसके बाद औरंगजेब भी गंभीर रूप से बीमार हो गया। तब उसने माता से मांफी मांगते हुए वहां जलने वाले अखंड दीपक के लिए हर महीने सवा मण तेल भेंट करने का वचन दिया। अब केंद्र सरकार द्वारा इसके लिए तेल की व्यवस्था की जाती है।

जीण माता के सम्बन्ध में कुछ तथ्य

अन्य नाममीणों, चौहानों की कुलदेवी, मधुमक्खियों की देवी, शेखावाटी क्षेत्र की लोक देवी, जयंती देवी की पीठ
जन्म स्थान धांधू गांव (सीकर)
कुल चौहान राजपूत कुल
प्रमुख मंदिररेवासा(सीकर)
जीण माता मेलाचैत्र व अश्विन मास के नवरात्रों में
भक्ति गीतइनकी भक्ति में गया जाने वाला गीत सबसे लंबा माना जाता है जो ‘चिरंजा’ कहलाता है ।
मूर्ति अष्टभुजा युक्त

कैला देवी

प्रमुख मंदिर – करौली

कैला देवी का मंदिर करौली से 20 कि.मी. दूर त्रिकूट पर्वत की घाटी में कालीसिंध के तट पर स्थित है। इन्हे करौली के यदुवंशी(यादवों) राजवंश की कुलदेवी तथा गुर्जर व मीणाओ की इष्ट देवी माना जाता है। मंदिर के मुख्य कक्ष में कैलादेवी व चमुंडादेवी की प्रतिमाएं प्रतिष्ठापित है। परिसर में एक हनुमान मंदिर भी बना हुआ है जिसे स्थानीय भाषा में लांगुरिया कहा जाता है। कैला देवी के इस मंदिर के सामने बोहरा भक्त की छतरी स्थित है। देवी की आराधना में भक्त प्रसिद्ध लांगुरिया गीत गाते हैं व जोगणियां नृत्य करते है।यहाँ प्रतिवर्ष चैत्रमास की शुक्ल अष्टमी को मेला लगता है। जिसमें हजारों लाखों भक्त देवी के दर्शन करने आते हैं।इस अवसर पर यहाँ पशु मेला भी लगता है।

कैला देवी की पौराणिक कथा

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार जब कंस ने वासुदेव व देवकी को कारागार में डाल दिया था तब देवकी ने कारागृह में ही एक पुत्री को जन्म दिया था। जब कंस ने उस नवजात कन्या को मारने का प्रयास किया तो वह उसके हाथ से छूट कर आकाश की और उड़ गई। माना जाता है की जब वह कन्या भूमण्डल पर अवतरित हुई तो करौली की त्रिकूट पर्वत पर कैला देवी के नाम से प्रसिद्ध हुई। इन्हे श्री कृष्ण की बहन अथवा हनुमान जी की माता माना जाता है।

राजस्थान की लोकदेवियाँ: सकराय माता

प्रमुख मंदिर – उदयपुरवाटि, झुंझुनू

सकराय माता को अन्य नाम शाकम्बरी माता के नाम से भी जाना जाता है। इनका मुख्य मंदिर झुंझुनू के उदयपुरवाटि में स्थित है। इसके अन्य मंदिर जयपुर के सांभर में तथा उत्तरप्रदेश के सहारनपुर में भी स्थित है। शाकम्बरी माता चौहानो की इष्ट देवी है तथा खण्डेलवालों की कुलदेवी है।

लोकहित से जुडी कथा
सकराय माता ने अकाल के समय जनता को बचाने के लिए फल, सब्जिया, कंदमूल उगाये थे इस कारण इन्हे शाकम्बरी माता कहा गया।

आशापुरा माता

प्रमुख मंदिर – नाडोल गाँव, पाली

आशापुरा माता चौहानो व बिस्सा ब्राह्मणो की कुलदेवी है। इनका मुख्य मंदिर पाली जिले के नाडोल कस्बे में है। जालौर के मोदरा कस्बे में भी इनका मंदिर स्थित है। कहा जाता है की इन देवी की पूजा करते समय महिलाएं घूँघट निकलती है तथा हाथों में मेहँदी नहीं लगाती है।

शीतला माता

शीतला माता राजस्थान की एक प्रमुख लोकदेवी है। राजस्थान के अतिरिक्त अन्य राज्यों में भी इनकी पूजा की जाती है। जयपुर जिले की चाकसू तहसील में स्थित शील की डूंगरी गाँव में इनका प्रमुख मंदिर स्थित है यहाँ चैत्र कृष्णा सप्तमी अष्टमी को शीतला माता का मेला लगता है। पहाड़ी पर स्थित इस मंदिर का निर्माण जयपुर के शासक माधोसिंह ने करवाया था। दूर-दूर से ग्रामीण रंगीन कपड़ों में सजे, अपनी सुसज्जित बैलगाड़ियों से मेले में आते हैं, इसलिए इसे ‘बैलगाड़ी मेले’ के नाम से जाना जाता है। माता का पुजारी कुम्हार जाती का ही होता है। इस अवसर पर पशु मेले का आयोजन भी किया जाता है।

शीतला माता को मातृरक्षिका देवी के रूप में पूजा जाता है। एकमात्र देवी है जिनकी खंडित मूर्ति की पूजा की जाती है। चैत्र कृष्णा सप्तमी अष्टमी को शीतला सप्तमी या शीतला अष्टमी का पर्व मनाया जाता है इस दिन माता को बासी भोजन का भोग लगाकर स्वयं भी वही भोजन ग्रहण किया जाता है। स्कंद पुराण में शीतला देवी का वाहन गर्दभ बताया गया है। ये हाथों में कलश, सूप, मार्जन (झाडू) तथा नीम के पत्ते धारण करती हैं। इन्हें चेचक आदि कई रोगों की देवी बताया गया है। उत्तर भारत में इन्हे ‘महामाई’, पश्चिम भारत में ‘माई अनामा’ और राजस्थान में सेढ, शीतला तथा सैढल माता के रूप में जाना जाता है। शीतला माता को बच्चों की संरक्षिका माना जाता है।। ऐसी मान्यता है कि चेचक का प्रकोप माता की रुष्टता के कारण ही होता है।

शीतला माता के सम्बन्ध में कुछ तथ्य

अन्य नाममातृरक्षिका देवी, महामाई, सैढल माता, चेचक रक्षक देवी
प्रमुख मंदिरचाकसू (जयपुर)
मेलाचैत्र कृष्णा सप्तमी अष्टमी
वाहनगर्दभ(गधा)
पुजारी कुम्हार जाति का
मूर्ति खण्डित मूर्ति

दधिमती माता

दधिमती माता दाधीच ब्राह्मणों की कुलदेवी हैं। इनका प्रमुख मंदिर नागौर जिले के जायल तहसील के गोठ मांगलोद गांव में स्थित है। यह मंदिर उत्तरी भारत के पुराने मन्दिरों में से एक है।

दधिमती माता की पौराणिक कथा

जनश्रुति के अनुसार तीव्र ध्वनि के साथ दधिमती माता की प्रतिमा धरती से निकलना प्रारम्भ हुई तो इतनी तेज आवाज हुई की जिसे सुनकर कर आसपास के ग्वाले व गायें भयभीत होकर वहां से भागने लगे। इस कारण माता का कपाल मात्र ही बाहर निकल पाया बाकी शरीर धरा में ही रह गया इस कारण इस क्षेत्र को कपाल-पीठ के नाम से भी जाना जाता है।

दधिमती दधीचि ऋषि की बहिन थीं और इनका जन्म माघ महीने के शुक्लपक्ष की सप्तमी को हुआ था। दधिमती ने माघ महीने की अष्टमी को दधी नगर में दैत्य विकटासुर को मारा था। दधिमती देवी लक्ष्मीजी की अवतार थीं।

दधिमती माता के सम्बन्ध में कुछ तथ्य

अन्य नामदायमा, दाहिमा, दाधीच ब्राह्मणों की कुलदेवी
प्रमुख मंदिरगोठ मांगलोद (नागौर)
मेलाचैत्र व अश्विन मास के नवरात्रों में
पूजा प्रतीककपाल

राना बाई

रानाबाई का जन्म सन् 1543 में नागौर जिले के हरनावा गांव में जाट कुल में चौधरी जालमसिंह चौधरी के घर में हुआ। वे एक वीरांगना तथा कवयित्री थीं। उन्हें राजस्थान की दूसरी मीरा के रूप में भी जाना जाता है। संत चतुर दास (खोजीजी) को वे अपना गुरु मानती थी। रानाबाई ने राजस्थानी भाषा में कई कविताओं की रचना की।उनके द्वारा सामान्य लय में रचित पदों के गायन का माध्यम ठेठ राजस्थानी था। उनके गीतों का संग्रह ‘पदावली’ कहा जाता है।

रानाबाई ने विक्रम संवत् 1627 को फाल्गुन मास के शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी को जीवित समाधि ली। वे एकमात्र महिला संत है जो कुंवारी सती हुई। प्रत्येक मास की शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी को हरनावां गाँव में रानाबाई के धाम पर मेला भरता है। भाद्रपद और माघ मास के शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी को विशाल मेला लगता है जिसमे भक्तों की अपार भीड़ रहती है।

रानाबाई से जुडी दंतकथा

एकबार रानाबाई के पिता श्री जालम सिंह, खिंयाला गाँव से कृषि का लगान भरकर अपने गाँव हरनावां लौट रहे थे तो रास्ते में गेछाला नाम के तालाब में भूतों ने उन्हें घेर लिया व राना का विवाह बोहरा भूत के साथ करने का प्रस्ताव दिया। उस समय जालम सिंह ने अपनी पुत्री के विवाह की सहमति भूतों को दे दी। जब भूत समुदाय आंधी-तूफान के रूप में जालम सिंह के घर पहुँचा तब रानाबाई ने अपनी ईश्वरीय शक्ति से उनका सर्वनाश किया तथा कभी विवाह न करने का प्रण लिया।

अहमदाबाद युद्ध के दौरान रानाबाई ने जोधपुर में महाराजा ठाकुर श्री राज सिंह को पीठ पर गोबर के हाथ का छापा लगाकर आशीर्वाद दिया था।

राना बाई के सम्बन्ध में कुछ तथ्य

जन्मसन् 1543
अन्य नामराजस्थान की दूसरी मीरा
पिता चौधरी जालमसिंह धूण
गुरुसंत चतुर दास (खोजीजी)
जन्म स्थान हरनावा गांव(नागौर)
कुल जाट
समाधिविक्रम संवत् 1627 को फाल्गुन मास के शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी को जीवित समाधी ली थी।
प्रमुख मंदिररानाबाई धाम (हरनावां)
राना बाई मेलाप्रत्येक मास की शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी को नागौर जिले के हरनावां गाँव में रानाबाई धाम पर मेला लगता है। तथा भाद्रपद शुक्ल त्रयोदशी को बड़ा विशाल मेला लगता है।
रानाबाई के गीत उनके गानों के संग्रह को ‘पदावली’ कहा जाता है।

केवाय माता

प्रमुख मंदिर – किणसरिया गाँव, नागौर

नागौर जिले के मकराना और परबतसर गाँव के बीच स्थित गाँव किणसरिया में स्थित विशाल पर्वत श्रंखला की सबसे ऊँची चोटी पर कैवायमाता का बहुत प्राचीन और प्रसिद्ध मन्दिर स्थित है । नैणसी के अनुसार किणसरिया का पुराना नाम सिणहाड़िया था। माता का यह मन्दिर लगभग 1000 फीट उँची विशाल पहाड़ी पर स्थित है । मन्दिर तक पहुँचने के लिए 1121 सीढ़ियों का सर्पिलाकार पक्का मार्ग बना हुआ है।
इस मन्दिर के सभामण्डप की बाहरी दीवार पर विक्रम संवत 1056 (999 ई.) का एक शिलालेख उत्कीर्ण है । उक्त शिलालेख से ज्ञात होता है कि भवानी के इस भव्य मन्दिर का निर्माण दधीचिक वंश के शाशक चच्चदेव ने जो की साँभर के चौहान राजा दुर्लभराज (सिंहराज का पुत्र) का सामन्त था ने विक्रम संवत 1056 की वैशाख सुदि 3, अक्षय तृतीया रविवार अर्थात 21 अप्रैल, 999 ई. के दिन करवाया था।

नारायणी माता

नारायणी माता का विवाह अलवर के राजोरगढ़ के कर्णेश से हुआ था। विदाई के बाद नारायणी माता अपने पति के साथ पैदल ही ससुराल जा रही थी। जब दिन में आराम करने हेतु उन्होंने एक बरगद की छाँव में शरण ली तब उनके पति को एक साप ने काट लिया जिससे उनकी मृत्यु हो गई। सूर्यास्त के समय जब नारायणी माता की नींद खुली तो उन्हें पति की मृत्यु का पता चला उनके सहायता मांगने पर मीणा जाति के लोगों ने उनकी सहायता की तथा लकड़ियां एकत्रित कर चिता तैयार की जिसमे नारायणी माता अपने पति के साथ सती हो गई। उसी समय आकाशवाणी हुई और माता ने सहायता करने वालों से वरदान मांगने को कहा तब लोगों ने माताजी से इस जंगल में पानी की व्यवस्था करने की प्रार्थना की। तब माताजी ने कहा कि कोई भी व्यक्ति हाथ में एक लकड़ी लेकर इस स्थान से भागे और पीछे मुड़ कर न देखे। जहाँ तक वह भागते हुए जायेगा उस स्थान तक जलधारा पहुँच जाएगी। लेकिन केवल 3 किलोमीटर तक ही दौड़ कर उस व्यक्ति ने पीछे मुड़ कर देख लिया और जल की धारा वहीं पर रूक गई। उस स्थान पर आज भी एक जलधारा अनवरत रूप से निकल रही है और वह केवल 3 किलोमीटर तक ही बहती है।
बरगद के उसी पेड़ के नीचे जहाँ उनके पति को सर्प ने काटा था माताजी का भव्य मंदिर बनाया गया।मन्दिर का निर्माण 11वीं सदी में प्रतिहार शैली से करवाया गया। मंदिर के ठीक सामने संगमरमर का एक कुण्ड है जिसमे मंदिर के ठीक पीछे से एक प्राकृतिक जलधारा बहकर पहुँचती है।

नारायणी माता के सम्बन्ध में कुछ तथ्य

जन्म विक्रमी संवत् 1006 चैत्र शुक्ल नवमी
प्रमुख मंदिरबरवा की डूंगरी (राजगढ़ तहसील, अलवर)
मन्दिर निर्माण शैली प्रतिहार शैली
मेलाप्रतिवर्ष वैशाख शुक्ल एकादशी
कुल देवीनाई जाति
पुजारीमीणा जाति

सच्चियाय माता

सच्चियाय माता का मंदिर राजस्थान के जोधपुर जिले में ओसियाँ गाँव में स्थित है। इन्हे ओसवाल, जैन, परमार, पंवार, कुमावत, राजपूत, जाट, चारण पारिक,माहेश्वरी इत्यादि जातियों के लोग पूजते हैं। इस मंदिर का निर्माण परमार राजकुमार उपलदेव द्वारा करवाया गया था। जैन धर्म के लोगों की इनमे विशिष्ट मान्यता है। यह ओसवाल समाज की कुलदेवी है।

सच्चियाय माता के सम्बन्ध में कुछ तथ्य

प्रमुख मंदिरओसियाँ, जोधपुर
मन्दिर निर्माणपरमार राजकुमार उपलदेव द्वारा
मन्दिर निर्माण शैली महामारू शैली
कुल देवीओसवाल समाज की
प्रतिमाकाले प्रस्तर की महिषासुर मर्दिनी की मूर्ति

रानी सती माता

रानी सती मंदिर राजस्थान के झुंझुनू में स्थित है। इस मंदिर का इतिहास 400 वर्ष प्राचीन है। रानी सती माता एक राजस्थानी महिला रानी थी। इनका वास्तविक नाम नारायणी था। एक युद्ध के दौरान नारायणी देवी के पति की मृत्यु हो जाती है जिसके बाद वो भी उनके साथ सती हो जाती है। लोग इन्हें आदि शक्ति का रूप मानते है और रानी सती के रूप में इनकी पूजा करते है।

रानी सती माता के सम्बन्ध में कुछ तथ्य

वास्तविक नाम नारायणी बाई
अन्य नामदादीजी
जन्म स्थान महनगांव (झुंझुनु)
पति का नाम तन धन दास अग्रवाल
सती1595 ई. (संवत्1952) में सती।
प्रमुख मंदिरझुंझुनू
रानी सती मेलाभाद्रपद अमावस्या को

राणी भटियाणी

जैसलमेर के ठाकुर जोगराज सिंह भाटी की पुत्री स्वरूप कंवर का विवाह जसोल के रावल कल्याणमल के साथ संपन्न हुआ था। कल्याणमल के प्रथम विवाह से संतान की प्राप्ति न होने के कारण उन्होंने दूसरा विवाह स्वरूप कंवर भटियाणी से किया था। विवाह के 2 वर्ष पश्चात् जब स्वरुप कँवर को पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई तब द्वेषवश कल्याणमल की प्रथम पत्नी ने उनके पुत्र की ज़हर दे कर हत्या कर दी। पुत्र वियोग में स्वरुप कँवर भी देवलोक हो गई।

राणी भटियाणी की मृत्यु का समाचार सुन कर जसोल ठिकाने में शोक छा गया। कुछ दिन बाद राणी भटियाणी के गांव से दो ढोली शंकर व ताजिया रावल कल्याणमल के यहां कुछ मांगने के लिए गए पर वहां से कुछ प्राप्त न होने पर निराश हो अपने गाँव के ‘बाईसा के चबूतरे के आगे जाकर सच्चे मन से विनती करने लगे तब राणी भटियाणी ने प्रसन्न होकर उन दोनों को साक्षात दर्शन दिए और परचे के प्रमाण स्वरूप रावल कल्याणमल के नाम एक पत्र दिया जिसमें रावल की मृत्यु उस दिन से ठीक बारहवें दिन होना लिखा और ऐसा ही हुआ। इसके बाद से राणी भटियाणी की मान्यता बढ़ गई और उन्होंने जनहित में अनेक परचे दिए।जसोल के ठाकुरों ने राणी भटियाणी के चबूतरे पर एक मंदिर बनवा दिया और उनकी विधिवत पूजा करने लगे।
प्रतिवर्ष चैत्र और आश्विन माह के नवरात्र में वैशाख, भाद्रपद और माघ माह की शुक्ल पक्ष की तेरस व चौदस को यहाँ श्रद्धालु आते हैं। तथा मनौती पूर्ण होने पर जात देते है तथा कांचळी, लूगड़ी, बिंदिया और चूड़ियां आदि चढ़ाते हैं।

राणी भटियाणी के सम्बन्ध में कुछ तथ्य

जन्मवि.सं. 1725
वास्तविक नाम स्वरूप कंवर
पिता ठाकुर जोगराज सिंह भाटी
जन्म स्थान जैसलमेर
कुल भाटी
प्रमुख मंदिरजसोल (बाड़मेर)
राणी भटियाणी मेलाभाद्रपद शुक्ल त्रयोदशी

चामुंडा माता

मुख्य मंदिर – मेहरानगढ़ किला (जोधपुर )

जोधपुर में मेहरानगढ़ किले के दक्षिणी भाग में चामुंडा माता मंदिर स्थित है। यह शाही परिवार की इष्ट देवी है तथा प्रतिहारों की कुलदेवी है। जोधपुर शहर के संस्थापक राव जोधा ने किले में चामुंडा देवी की मूर्ति को स्थापित किया था जोधपुर के अतिरिक्त अन्य जिलों से भी लोग देवी के दर्शन हेतु आते है। नवरात्रों व दशहरे के समय यहाँ भक्तों की बड़ी तादाद देखने को मिलती है। 30 सितम्बर 2008 (मेहरानगढ़ दुखांतिका) को यहाँ भगदड़ मच गई थी जिसमे भारी जनहानि हुई थी। इस दुर्घटना की जांच हेतु जसराज चोपड़ा आयोग की स्थापना की गई थी।

आईजी माता

आईजी माता का जन्म 15वीं शताब्दी में हुआ था इनका मूल नाम जीजी बाई था। ये रामदेव जी की शिष्या थी तथा इन्होने समाज के निम्न वर्ग को ऊपर उठाने व छुआछूत की भावना को समाप्त करने हेतु प्रयास किये थे। ये सिरवी समाज की कुल देवी है। इनके अनुयायियों में 11 नियमों का पालन अनिवार्य है जिन्हे बैल के ग्यारह नियम कहते है।इन्हे नवदुर्गा व देवी का अवतार मान कर पूजा की जाती हैं के पुजारी को दीवान व इनके थान को बढेर कहा जाता है। इनके मंदिर को इनके भक्त “हरगाह” भी कहते है। इनके मंदिर में मूर्ति न होकर केवल तस्वीर होती है | कहा जाता है इनके मंदिर में दीपक की ज्योत से केसर टपकती है।

आईजी माता के सम्बन्ध में कुछ तथ्य

जन्म15वीं शताब्दी
मूल नामजीजी बाई
गुरुरामदेव जी
प्रमुख मंदिरबिलाड़ा (जोधपुर)
पुजारीदीवान
थानबढेर
पूजा प्रतीकमूर्ति न होकर केवल तस्वीर
कुल देवी सिरवी समाज

राजस्थान की लोकदेवियाँ : तन्नोट माता

तन्नोट माता का मन्दिर जैसलमेर जिले से लगभग 130 किमी दूर स्थित हैं। इन्हे तनोट राय नाम से पूजा जाता है इनको हिंगलाज माता जो वर्तमान में बलूचिस्तान (पाकिस्तान) में है का ही एक रूप कहा जाता है। भाटी राजपूत नरेश तणुराव ने वि॰सं॰ 828 में तनोट माता का मंदिर बनवाकर मूर्ति को स्थापित किया था।
माना गया है कि भारत और पाकिस्तान के मध्य जो सितम्बर 1965 को लड़ाई हुई थी, उसमें पाकिस्तान के सैनिकों ने मंदिर पर कई बम गिराए थे लेकिन माँ की कृपा से एक भी बम नहीं फट सका था। तभी से सीमा सुरक्षा बल के जवान इस मन्दिर के प्रति काफी श्रद्धा भाव रखते हैं।

तन्नोट माता के सम्बन्ध में कुछ तथ्य

अन्य नामरुमाल वाली देवी, थार की वैष्णो देवी
प्रमुख मंदिरतन्नोट, जैसलमेर
पुजारी BSF के जवान

स्वांगिया माता

स्वांगिया माता जैसलमेर के भाटी राजवंश की कुलदेवी है। इनका मुख्य मंदिर जैसलमेर के भादरिया में स्थित है। माता का प्रतीक चिन्ह सुगन चिड़ी है। जैसलमेर के राज चिन्ह में सुगन चिड़ी के हाथ में मुदा हुआ भाला है। इनके आशीर्वाद से ही उत्तर के आक्रमण रुके, इसलिए यह ‘उत्तर भड़ किवाड़’ भी कही जाती है।

स्वांगिया माता के सम्बन्ध में कुछ तथ्य

प्रमुख मंदिरभादरिया(जैसलमेर)
प्रतीकसुगन चिड़ी
अन्य नामउत्तर भड़ किवाड़
कुल देवीजैसलमेर के भाटी राजवंश की

जमवाय माता

जमवाय माता ढूंढाड़ के कच्छवाह वंश की कुल देवी है। जामवा रामगढ़, जयपुर जिला का एक कस्बा है जिसका नाम माता के नाम पर ही रखा गया है। जमवाय माता का मंदिर रामगढ़ बांध से कुछ ही दूरी पर रामगढ़ की पहाड़ियों की घाटी में स्थित है। इसका पौराणिक नाम जामवन्ति है। इस मंदिर की स्थापना कछवाहा वंश के राजा दूलहराय ने की थी। इस मंदिर के गर्भगृह में तीन मूर्तियॉ विराजमान है। पहली मूर्ति गाय के बछडे के रूप में विराजमान है, दूसरी मूर्ति श्री जमवाय माता जी की है और तीसरी मूर्ति बुडवाय माता जी की है।

जमवाय माता के सम्बन्ध में कुछ तथ्य

प्रमुख मंदिरजामवा रामगढ़ (जयपुर)
स्थापककछवाहा वंश के राजा दूलहराय
पौराणिक नामजामवन्ति
कुल देवीढूंढाड़ के कच्छवाह वंश की

राजस्थान की लोकदेवियाँ: जिलाड़ी माता

प्रमुख मंदिर – बहरोड़ (अलवर)

जिलाड़ी माता अलवर क्षेत्र की लोक देवी है। इन्होने मुस्लिम शासकों द्वारा जबरन पकड़े गए हिन्दुओं को बलपूर्वक मुस्लिम बनाने के प्रयत्नों का विरोध किया व अपनी बहादुरी व पराक्रम से इन्हे निष्फल किया तभी से इन्हे लोकदेवी मान कर पूजा जाता है। इनके मंदिर में प्रतिवर्ष 2 बार मेला लगता है

नागणेची माता

इतिहास के अनुसार राठौड़ वंश की कुलदेवी नागणेची माता की मूर्ति राव सीहाजी के पोत्र राव दूहड़ जी कन्नौज से लाये थे तथा राजस्थान के बाड़मेर ज़िले में नागाणा गांव में मन्दिर की स्थापना की थी। नागणेच्या माता राठौड़ों व सोढा ( राजपुरोहित ) की कुलदेवी मानी जाती है।इनकी 18 भुजाओं वाली प्रतिमा जोधपुर में राव बीका ने स्थापित की थी।

नागणेची माता के सम्बन्ध में कुछ तथ्य

प्रमुख मंदिरनागाणा गांव (बाड़मेर)
स्थापना13 वीं सदी में
स्थापकराठौड़ राजा धुहड़ जी ने
कुल देवीमारवाड़ के राठौड़ वंश की

राजस्थान की लोकदेवियाँ: बायणमाता

मेवाड़ के गुहिल राजवंश एवं इससे पृथक सिसोदिया शाखा व उसकी सभी उपशाखाओं जैसे राणावत, चुण्डावत, शक्तावत आदि की कुलदेवी बायणमाता है। इनका मुख्य मंदिर चित्तौड़ दुर्ग में स्थित है। दलपत विजय रचित खुम्माण रासो में माँ बायण की बाप्पा रावल पर विशेष कृपा थी इसका उल्लेख मिलता है। इनका एक मंदिर राजसमंद के केलवाड़ा में भी स्थित है।

बायणमाता के सम्बन्ध में कुछ तथ्य

प्रमुख मंदिरचित्तौड़ दुर्ग
कुल देवीमेवाड़ के गुहिल राजवंश

त्रिपुर सुंदरी माता

त्रिपुर सुंदरी माता का मंदिर बांसवाड़ा के तलवाड़ा में स्थित है। यह मंदिर भगवती साधकों का साधना स्थल है। इस मंदिर के गर्भ में भगवती की काले पत्थर की अष्टदश भुजा वाली भव्य प्रतिमा प्रतिष्ठित है। बांसवाड़ा डूंगरपुर में भक्तों द्वाड़ा इन्हे तरताई माता के नाम से भी पुकारा जाता है। लोहार जाति के लोगों द्वारा इनकी पूजा की जाती है।

त्रिपुर सुंदरी माता के सम्बन्ध में कुछ तथ्य

प्रमुख मंदिरतलवाड़ा (बांसवाड़ा)
अन्य नामतुरतई माता
कुल देवीपांचाल जाति की

राजस्थान की लोकदेवियाँ: सुगाली माता

मुख्य स्थान – सुगाली (पाली)

सुगाली माता स्वतंत्रता सेनानी ठाकुर कुशाल सिंह चाम्पावत के आऊवा(पाली) राजघराने की कुल देवी है। आऊवा की कुलदेवी और आराध्या इस देवी की समूचे मारवाड़ में बहुत मान्यता रही है।काले पत्थर की बनी माता की प्राचीन प्रतिमा के 54 हाथ व 10 मस्तक है। यह देवी प्रतिमा सन् 1857 के स्वाधीनता संग्राम में स्वतंत्रता सेनानियों की प्रेरणास्त्रोत रही है। कहा जाता है कि स्वतंत्रता सेनानी अपनी गतिविधियां इस देवी के दर्शन करके ही प्रारम्भ करते थे। स्वतंत्रता सेनानियों का दमन कर आऊवा के किले पर अधिकार करते ही अंग्रेजों ने इस प्रतिमा को आऊवा के किले से हटा कर आबू ले गए तथा सन् 1908 में अजमेर में राजपूताना म्यूजियम भेज दी।अब यह मूर्ति पाली संग्राहलय में है।
सुगालीमाता की इस मूर्ति में देवी राक्षस के ऊपर क्रोधित मुद्रा में खड़ी है और राक्षस धरती पर अधोमुख पड़ा है। देवी राक्षस पर नृत्य की अवस्था में है। देवी के 10 सिर ओऱ 54 हाथ है। एक मुख मानव का है तथा अन्य मुँह वभिन्न पशुओं के है। देवी के सभी हाथों में विभिन्न प्रकार के शस्त्र तथा गले में मुण्डमाला सुशोभित है जो घुटनों तक लटकी हुई है। मूर्ति की ऊचाँई 3 फुट 8 इन्च के लगभग है।

राजस्थान की लोकदेवियाँ व उनके प्रमुख स्थल

माता प्रमुख मंदिरविशेषता
ब्राह्मणी मातासोरसेन (बारां)विश्व की एकमात्र देवी जिनकी पीठ का श्रृंगार व पूजा की जाती है।
माघ शुक्ल सप्तमी (गधों का मेला) को यहाँ मेला लगता है।
छींक माताजयपुरराजस्थान में कई स्थानों पर विवाह के समय छींक का अपशगुन टालने हेतु दुल्हन को छींक का डोरा व पातड़ी पहनाई जाती है। माघ शुक्ल सप्तमी को यहाँ मेला लगता है।
दधिमती मातागोठ मांगलोद (नागौर)दधिमती माता दाधीच ब्राह्मणों की कुलदेवी है।
इस मंदिर के गुंबद पर हाथ से पूरी रामायण उकेरी गई है।
भंवाल माताभंवाल (नागौर)इन्हे ढाई प्याला शराब चढ़ाई जाती है।
सुंधा माताभीनमाल (जालौर)यहां रोप-वे स्थापित है।
यहाँ भालू अभ्यारण स्थापित है।
लटियाल माताफलौदी (जोधपुर)इनका अन्य नाम ‘खेजड़ बेरी राय भवानी‘ भी है।
यह कल्ला ब्राह्मणों की कुलदेवी है।
भदाणा माताभदाणा (कोटा)यहाँ मूठ से पीड़ित व्यक्ति का इलाज किया जाता है।
बड़ली माताआकोला (चित्तौड़)यह मंदिर बेड़च नदी के किनारे स्थित है।
इस मंदिर की दो तिबारियों से बच्चे को निकालने से असाध्य रोग सही हो जाते है।
आवड़ माता
सुराणा मातागोरखाण गाँव (नागौर)सुराणा माता ने जीवित समाधी ली थी।
आमजा मातारीछड़ा (राजसमंद)भील जाति के लोक इनकी पूजा करते है।
राजेश्वरी माताभरतपुरभरतपुर के जाट राजवंश की कुलदेवी है।
ज्वाला माताजोबनेर (जयपुर)खंगारोतों की इष्टदेवी |
यह शक्ति पीठ है यहाँ माता का घुटना गिरा था। राव जैतसी द्वारा इनकी उपासना की जाती थी।
महामायामावली (उदयपुर)इन्हे शिशु रक्षक लोकदेवी माना जाता है।
आवरी मातानिकुम्भ (चित्तौड़गढ़)आवरी माता के यहाँ लकवाग्रस्त लोगों का इलाज किया जाता है।
मरकंडी मातानिमाज (पाली)इसका निर्माण गुर्जर प्रतिहार वंश के राजा ने 9वी शताब्दी में करवाया था।
क्षेमकारी माताभीनमाल (जालौर)क्षेमकारी माता को स्थानीय भाषा में क्षेमज, खीमज, खींवज आदि नामो से पुकारा जाता है।
घेवर माताराजसमंदघेवर माता अपने हाथों में होम की ज्वाला प्रज्जवलित कर अकेली सती हुई थी ।
अर्बुदा/अधर देवीमाउंट आबू (सिरोही)यह 51 शक्तिपीठों में शामिल एक शक्ति पीठ है। पौराणिक मान्यता के अनुसार यहां मां पार्वती के होठ गिरे थे। इनकी पूजा देवी दुर्गा के छठे स्वरुप मां कात्यायनी के रूप में होती है।प्रतिवर्ष चैत्र व अश्विन पूर्णिमा को मेला लगता है।
वांकल मातावीरातरा (बाड़मेर)यह नन्दवाणा ब्राह्मणों की कुलदेवी के रूप में विख्यात है। बांकल देवी के पुजारी पंवार राजपूत हैं।
नगदी माताजय भवानीपुरा (जयपुर)
कंठेसरी माता यह आदिवासियों की कुलदेवी है।
हर्षद माताआभानेरी (दौसा)आभानेरी में चाँद बावड़ी बनी हुई है।
कालिका माता चित्तौड़गढ़ दुर्गइस मंदिर में जगह-जगह पर सूर्य की मूर्तियां बनी हुई है।
यह गहलोत वंश की कुलदेवी है।
बदनौर की कुशला माताभीलवाड़ा
खोरड़ी माताकरौली
बीजासन माता इंद्रगढ़ (बूंदी)1760 में इंदौर के महाराजा शिवाजीराव होलकर ने इस मंदिर का निर्माण करवाया था।
इन्हे सौभाग्य और पुत्रदायिनी माता माना जाता है।

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