राजस्थानी हस्तशिल्प

आज सम्पूर्ण विश्व में राजस्थानी हस्तशिल्प को सराहा जाता है। अपने अनूठेपन, सूक्ष्मता और सौन्दर्य में यह विलक्षण है। राजस्थान का यह बहु प्रशंसित हस्तशिल्प लगभग उतना ही पुराना है जितना स्वयं मानव का अस्तित्व है। जब मनुष्य ने पत्थरों के औज़ार बनाने शुरू किए तभी से राजस्थान की धरा पर हस्त शिल्प की शुरुआत हो गई थी। कालीबंगा की खुदाई से सिंधु घाटी सभ्यता के जो अवशेष मिले हैं उनसे इस बात के पर्याप्त प्रमाण मिलते हैं कि तब भी राजस्थान हस्तकलाओं का एक प्रमुख केन्द्र था। राजस्थान की समृद्ध हस्तकलाओं के अनेक उदाहरण यहां के विभिन्न संग्रहालयों में भी देखे जा सकते हैं। राजस्थान की हस्तकलाओं का सीधा सम्बन्ध यहां की समृद्ध सांस्कृतिक परंपराओं और यहां की श्रमशील जीवन शैली से है। राजपूत और मुगल सरदारों की निकटता ने यहां की बहुत सारी कलाओं को प्रभावित किया और अब भी उनमें इन दो संस्कृतियों के आदान-प्रदान के चिन्ह देखे जा सकते हैं। अंग्रेजों ने स्वभावतः हमारी कलाओं को निरुत्साहित किया लेकिन यह हमारी अपनी कलाओं का ही दमखम था कि उनके सौतेले व्यवहार के बावजूद ये अपना अस्तित्व बनाए रख सकीं। आजादी के बाद भारत और राजस्थान की सरकारों ने कई तरह से यहां की हस्तकलाओं को प्रोत्साहन और संरक्षण देने के प्रयास किए और उनके सुपरिणाम अब नज़र आने लगे हैं। इस समय के साथ विभिन्न कलाओं के स्वरूप में अनेक परिवर्तन भी हुए लेकिन एक बात फिर भी बनी रही और वह यह कि यहां के कलाकारों ने स्थानीय कच्चे माल का ही अधिकांशतः प्रयोग किया है।

राजस्थान एक बहुरंगी और विविधता भरा प्रान्त है और यही रंगों और शैलियों की विविधता इसकी हस्तकलाओं में भी देखी जा सकती है। यह कहना जरा भी अतिशयोक्तिपूर्ण नहीं होगा कि प्रान्त के हर अंचल में कलाकार कुछ न कुछ ऐसा निर्मित करते हैं जो अनूठा होता है। जयपुर की ब्ल्यू पॉटरी, मीनाकारी, नक्काशी, हाथी दांत का काम, और मूर्ति कला, उदयपुर के लकड़ी के खिलौने, नाथद्वारा की पिछवई पेंटिंग, कोटा की डोरिया साड़ियां, जोधपुर की लहरिया और चून्दड़ियाँ, कशीदाकारी की जूतियां, प्रतापगढ़ की थेवा कला, मोलेला की मूर्ति कला, बाड़मेर, साँगानेर और बगरू की हाथ की छपाई, सवाई माधोपुर के खस के बने पानदान, कोई कहाँ तक गिनाए। यहां हम राजस्थानी हस्तकलाओं की कुछ अधिक प्रसिद्ध चीज़ों का परिचय दे रहे हैं.

ब्ल्यू पॉटरी

चीनी मिट्टी के सफेद बर्तनों पर किए गए नीले रंग के अंकन को ब्ल्यू पॉटरी के नाम से जाना जाता है। जयपुर इस कम के लिए विश्वविख्यात है। आजकल नीले के अतिरिक्त पीला, हलका भूरा और गहरा भूरा रंग भी इस शैली में प्रयुक्त किए जाने लगे हैं। इस काम के द्वारा डिज़ाइनर कप प्लेट, अन्य बर्तन और खिलौने व सजावटी सामान जैसे फूलदान आदि बनाए जाते हैं। राजस्थान में इस कला को सम्मान दिलाने और इसका प्रसार करने के लिए कृपाल सिंह शेखावत का नाम बहुत मान से लिया जाता है। भारत सरकार ने उन्हें पद्मश्री से भी अलंकृत कर उनके योगदान को मान्यता प्रदान की थी। राजस्थान के बहुत सारे महलों में भी इस काम के उदाहरण देखे जा सकते हैं।

मूर्तिकला

राजस्थान अपने संगमरमर के लिए तो प्रसिद्ध है ही, यहां अन्य कई तरह के पत्थरों की भी खूब सारी खानें हैं। डूंगरपुर का हरा काला, धौलपुर का लाल, भरतपुर का गुलाबी, मकराना का सफेद, जोधपुर का बादामी, राजसमन्द का कालेपन की झांई वाला सफेद, जालौर का ग्रेनाइट और कोटा का स्लेट पत्थर भी अपनी अलग पहचान रखते हैं। इतने सारे पत्थर जिस प्रदेश में मिलते हों, वहां मूर्तिकला का विकास स्वाभाविक ही माना जाएगा। राजस्थान की राजधानी जयपुर तो अपनी मूर्तिकला के लिए विख्यात है ही, अन्य अनेक स्थान भी अलग-अलग तरह के प्रस्तर कार्य के लिए जाने जाते हैं। कहीं विशाल मूर्तियां बनती हैं तो कहीं पत्थर पर बारीक नक्काशी कर जालियां झरोखे बनाए जाते हैं, और कहीं उनसे छोटे-बड़े खिलौने बनाए जाते हैं। काम जो भी हो, राजस्थान के हस्त शिल्पियों का कौशल देखते ही बनता है।

टेराकोटा

पकाई हुई मिट्टी से विभिन्न सजावटी व उपयोगी वस्तुओं का निर्माण टेराकोटा के नाम से जाना जाता है और नाथद्वारा के पास मोलेला इस काम के लिए विशेष रूप से प्रसिद्ध है। मोलेला के कलाकार मिट्टी के साथ लगभग एक चौथाई अनुपात में गोबर मिला कर ज़मीन पर थाप देते हैं और फिर उसी पर हाथ या बहुत साधारण उपकरणों से तरह-तरह की आकृतियां उकेरते हैं। इसे एक सप्ताह तक सूखने देने के बाद 800 डिग्री ताप में पकाकर गेरुए रंग से रंग दिया जाता है। इस तरह निर्मित वस्तुएं बहुत आकर्षक लगती हैं और इनकी भारी मांग है। रत्न और आभूषण

मुगल और राजपूत इन दो शासनों ने राजस्थान में रत्न और आभूषण निर्माण को विशेष रूप से प्रोत्साहित किया। जडाऊ गहनों के लिए जयपुर, बीकानेर और उदयपुर विख्यात हैं। जयपुर मूल्यवान पत्थरों के व्यापार और उन्हें तराशने के कौशल का एक बहुत बड़ा केन्द्र है। प्रतापगढ अपनी थेवा कला के लिए जाना जाता है। राजस्थान के विभिन्न जन जाति बहुत ग्रामीण क्षेत्र पीतल और चांदी के आभूषणों के लिए विख्यात हैं।

लाख का काम

जयपुर और जोधपुर लाख के बने आभूषणों, विशेष रूप से चूड़ियों, कड़ों, पाटलों के लिए प्रसिद्ध हैं। लाख के काम का अर्थ है चपड़ी को पिघला कर उसमें चाक, मिट्टी, बिरोजा आदि मिलाकर उसे गूंध लिया जाना और फिर उससे विभिन्न चीजें तैयार करना। इसमें और विविधता लाने के लिए लाख की चूड़ियों पर कॉच और मोती आदि से अतिरिक्त सजावट की जाती है। लाख से आभूषण ही नहीं खिलौने, मर्तियाँ और पेंसिल-पेन-चाबी के छल्ले आदि भी बनाए जाते हैं। इन चीजों की देश-विदेश में भारी माग रहती है।

कपड़े पर छपाई आदि का काम

वैसे तो राजस्थान के अधिकांश गांवों, कस्बों और शहरों में कपड़ों पर किस्म किस्म की छपाई का काम होता है परन्तु बगरू, सांगानेर, बाड़मेर, कालाडेरा, पाली और बस्सी (जिला चित्तौड़गढ) इस काम के लिए विशेष रूप से जाने जाते हैं। राजस्थान की छपाई में विभिन्न प्रकार के बेल-बूटों को पक्के रंगों में छापा जाता है। सांगानेर की छपाई के लिए यहां मिलने वाले पानी का विशेष महत्व है। उसमें डुबोने से कपड़े में एक खास तरह की चमक आ जाती है। गोबर, तिल्ली का तेल, बकरी की मेंगनी और सोड़े के मिश्रण से एक घोल बनाया जाता है और कपड़े को उसमें पूरी रात डुबोकर रखने के बाद सुखाया जाता है। सूखने के बाद उसे फिर से हरड़ के घोल में डुबाया जाता है और फिर लकड़ी के छापों (ब्लॉक्स) से उन पर छपाई की जाती है। छपाई के लिए सीमित रंगों का ही प्रयोग होता है। पहले ये रंग प्राकृतिक हुआ करते थे लेकिन अब उनकी जगह सिन्थेटिक रंग लेते जा रहे हैं।

राजस्थान में अनेक जगहों पर ग्रामीण महिलाएं कपड़ों पर कशीदाकारी भी करती हैं। सीकर झुंझुनू आदि के आसपास की स्त्रियां लाल गोटे की ओढनियों पर कशीदे से ऊंट, मोर, बैल, हाथी, घोड़े आदि बनाती हैं। मेव स्त्रियां भी इसी तरह की कशीदाकारी करती हैं। शेखावाटी में अलग-अलग रंग के कपड़ों को तरह-तरह के डिजाइनों में काट कर कपड़ों पर सिल दिया जाता है जिसे पैच वर्क कहा जाता है। गोटे किनारी और आरा तारी का काम भी राजस्थान के कई ग्रामीण अंचलों में होता है। आरा तारी के काम के लिए सिरोही जिले की और गोटे किनारी के लिए उदयपुर व जयपुर जिलों की बहुत प्रसिद्धि है।

कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि देश की राष्ट्रीय संस्कृति का अंग होते हुए भी राजस्थान की संस्कृति की अपनी कुछ विशेषताएं हैं। यहाँ के पर्व-त्योहारों, मेलों, रीति-रिवाजों आदि में यहां की खास प्रकार की भौगोलिक परिस्थितियों का निर्णायक योगदान है, प्राचीन होने के कारण यहाँ की संस्कृति में पारंपरिक मूल्यों का महत्त्व भी कुछ हद तक ज्यादा है और वेश-भूषा भी यहां की प्रतिकूल प्राकृतिक परिस्थितियों से प्रेरित है। प्रकृति यहां के बड़े भूभाग में कृपा है इसलिए यहां के निवासी अपने जीवन में राग-रंग को खुल कर तरजीह देते हैं।

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